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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली ९६
धीरु रघुबीरको बीरु रनबाँकुरो ·
हाँकि हनुमान कुलि कटकु कूट्यो ॥४६॥
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडको देखकर सिंह पर्वतपरसे उनपर
टूट पड़ता है, वैसे ही राक्षसोंके समूहको देखकर हनुमान्‌जी उनपर
झपट पड़े । चपतोंकी विकट चोटसे और पाँव पकड़कर पृथ्वीपर
पछाड़नेसे सब वीर निःशेष हो गये और सबका बल जाता रहा ।
गोसाईंजी कहते हैं कि वीरोंके पृथ्वीपर गिरनेसे पृथ्वी धड़कने
लगी और वीरोंको गिरते-गिरते स्यारोंने इस प्रकार लूट लिया जैसे
उठती हुई पैठको लुटेरे लूट लेते हैं । श्रीरामचन्द्रके धीर-वीर
रणबाँकुरे हनुमान्‌जीने ललकार-ललकारकर सारी सेनाकी कुन्दी
कर दी ।
छप्पै
कतहुँ बिटप-भूधर उपारि परसेन बरषत ।
कतहुँ बाजिसों बाजि मर्दि, गजराज करषत ॥
चरनचोट चटकन चकोट अरि-उर-सिर बज्रत ।
बिकट कटकु बिदरत बीरु बारिदु जिमि गज्जत ॥
लंगूर लपेटत पटकि भट, 'जयति राम, जय !' उच्चरत ।
तुलसीस पवननंदनु अटल जुद्ध क्रुद्ध कौतुक करत ॥४७॥
वे कहीं तो वृक्ष और पर्वत उखाड़कर शत्रुसेनापर बरसाते
हैं, कहीं घोड़ेसे घोड़ेको मसल डालते हैं और कहीं हाथियोंको
घसीट-घसीटकर मारते हैं । उनके लात और थप्पड़की चोट
शत्रुओंकी छाती और सिरपर बजती है । वे वीरवर उस कठिन
सेनाका संहार करते हुए मेघके समान गरजते हैं । योद्धाओंको
पूँछमें लपेटकर (पृथ्वीपर) पटकते हुए वे 'जय राम', 'जय राम'