कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें८९. . लंकाकाण्ड
'तुलसी' करि केहरिनादु भिरे भट, खग्ग खगे, खपुआ खरके ।
नख-दंतन सों भुजदंड विहंडत, मुंडसों मुंड परे झरकैं ॥३५॥
राक्षस (रावण) के वीर तीर, बरछी और सेलोंके समूह
फेंक-फेंककर मारते हैं और इधरसे ताड़ और तमालके वृक्ष तथा
पर्वतोंके बड़े-बड़े पैने टुकड़े चलते हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि सब
वीर सिंहनाद करके भिड़ गये । उनमें जो शूर थे, वे तो तलवारोंके
बीचमें धँस गये और कायर खिसक गये । (वानरगण) नख और
दाँतोंसे भुजदण्डोंको विदीर्ण करते हैं और (भूमिपर) पड़े हुए
मुंड एक-दूसरेका तिरस्कार करते हैं ।
रजनीचर-मत्तगयंद-घटा बिघटै मृगराजके साज लरै ।
झपटै भट कोटि महीं पटकै, गरजै, रघुबीरकी साँह करै ॥
तुलसी उत हाँक दसाननु देत, अचेत भे बीर, को धीर धरै ।
बिरुझो रन मारुतको बिरुदैत, जो कालहु कालु सो बूझि परै।३६।
(हनुमान्जी) राक्षसरूपी मतवाले हाथियोंके समूहका नाश
करते हुए सिंहके समान युद्ध करते हैं । (वे) झपटकर करोड़ों
वीरोंको पृथ्वीपर पटककर गरजते हैं और श्रीरामचन्द्रकी दुहाई देते
हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उधरसे रावण हाँक देता है, (जिसे
सुनकर, रामचन्द्रजीके पक्षके) वीर अचेत हो जाते हैं—(उस
हाँकको सुनकर) कौन ऐसा है जो धैर्य धारण कर सके । यशस्वी
वीर वायुनन्दन युद्धभूमिमें भिड़ गये, जो इस समय कालको भी
काल-से दीख पड़ते हैं ।
जे रजनीचर बीर बिसाल, कराल बिलोकत काल न खाए ।
ते रन-रोर कपीसकिसोर बड़े बरजोर परे पग पाए ॥