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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 228 में से

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पृष्ठ 88

८५ लंकाकाण्ड
(परशुरामजी) की कथा सुन ही ली। बलवान् बालि बातके
पीछे बरबाद हो गये। आपका भाई विभीषण भी (उनसे) जा
मिला। हे स्वामिन् ! सुनती हूँ, अब उन्होंने समुद्रके किनारे
पहुँचकर पड़ाव डाल दिया है।
पालिबे को कपि-भालु-चमू जम काल करालहु को पहरी है।
लंकसे बंक महा गढ़ दुर्गम ढाहिबे-दाहिबेको कहरी है॥
तीतर-तोम तमीचर-सेन समीरको सूनु बड़ो बहरी है।
नाथ ! भलो रघुनाथ मिलें रजनीचर-सेन हिएँ हहरी है ॥२९॥
हे नाथ ! वायुपुत्र (हनुमान्) बानर और भालुओंकी सेनाकी
रक्षाके लिये यम और कराल कालकी भी चौकसी करनेवाला है;
वह लङ्का-जैसे महाविकट और दुर्गम गढ़को ढाहने और जलानेमें
बड़ा उत्पाती है। निशाचरोंकी सेनारूप तीतरोंके समूहका नाश
करनेके लिये वह बड़ा भारी बाज है। हे नाथ ! अब रघुनाथजीसे
मिलनेहीमें भला है, निशाचरोंकी सेना हृदयमें थर्रा गयी है।
राक्षस-वानर-संग्राम
रोष्यौ रन रावनु, बोलाए वीर बानइत,
जानत जे रीति सब संजुग-समाजकी।
चली चतुरंग चमू, चपरि हने निसान,
सेना सराहन जोगु रातिचरराजकी॥
तुलसी बिलोकि कपि-भालु किलकत-
ललकत लखि ज्यों कँगाल पातरी सुनाजकी।