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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 228 में से

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पृष्ठ 86

परम कृपाल जो नृपाल लोकपालनि पै,
जब धनुहाई हैहै मन अनुमानि कै ॥
नाकमें पिनाक मिस बामता बिलोकि राम
रोक्यो परलोक लोक भारी भ्रम भानि कैं।
नाइ दस माथ महि, जोरि बीस हाथ, पिय !
मिलिए पै नाथ ! रघुनाथु पहिचानि कैं ॥२६॥
ये राजाओंका संहार करनेवाले हैं तथा पृथ्वीको ( कई बार )
निःक्षत्रिय कर चुके हैं, इनके हाथमें कठिन कुठार रहता है और
इनका वीरोंका-सा स्वभाव है, यह जानकर भगवान् श्रीरामने,
राजाओं तथा लोकपालोंपर अत्यन्त कृपापरवश हो मनमें यह
अनुमान किया कि जिस समय इनका परशुरामजीके साथ धनुष-
युद्ध होगा ( उस समय इन लोगोंकी क्या दशा होगी ) और यह
देखकर कि पिनाकके बहानेको लेकर इनकी नाक सिकुड़ गयी है,
परशुरामजीके परलोक ( स्वर्गप्राप्ति ) को रोक दिया और संसारके
भारी भ्रमको ( कि उनका सामना करनेवाला संसारमें कोई नहीं
है ) मिटा दिया । हे प्रिय ! उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीको ( ईश्वर )
जानकर अपने दसों सिर पृथ्वीपर रखकर और बीसों हाथ जोड़-
कर मिलो ।
कह्यो मतु मातुल, बिभीषनहूँ बार-बार,
आचरु पसारि पिय ! पायँ ले-ले हौं परी ।
बिदित बिदेहपुर नाथ ! भृगुनाथगति,
समय सयानी कीन्हो जैसी आइ गौं परी ॥
बायस, बिराध, खर, दूषन, कबन्ध, बालि,