कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ८०
तौलौं मिलु वेगि, जौलौं चापु न चढ़ायो राम,
रोषि बानु काढ्यो न दलैया दससीसको ॥२२॥
'तुमने एक वानरका बल तो अपनी आँखोंसे देख लिया; उसने
( अकेले ही ) वनको उजाड़ डाला, अक्षयकुमारको मारकर उसकी
सेनाको चूर्ण कर दिया और नगरमें आग लगा दी। तुम्हारे रहते
हुए ही ( दूसरे ) वानर ( अङ्गद ) ने राक्षसमण्डलीमें क्रोध करके
पैर रोप दिया, यह ( जो किसीसे नहीं हिला; ) तुलसीके स्वामी
श्रीरामचन्द्रजीका ही प्रभाव था। हे नाथ ! हमारी सम्मति सुनो,
कुलके नाशसे अन्ततः हानि ही है। अतः अब अपने चित्तसे अपनी
बीस भुजाओंका भरोसा त्याग दो और जबतक श्रीरामचन्द्र धनुष न
चढ़ावें और क्रोधित होकर दसों मस्तकोंको छेदन करनेवाला बाण
न निकालें तबतक ( शीघ्र ही ) उनसे मिल जाओ ।
'पवनको पूतु देख्यो दूत वीर बाँकुरो, जो
बंक गढ़ु लंक-सो ढकाँ ढकेलि ढाहिगो ।
बालि बलसालि को सो काल्हि दापु दलि कोपि,
रोप्यो पाउ चपरि, चमूको चाउ चाहिगो ॥
सोई रघुनाथु कपि साथ पाथनाथु बाँधि,
आयो नाथ ! भागे तें खिरिरि खेह खाहिगो ।
तुलसी गरबु तजि, मिलिबेको साजु सजि
देहि सिय, न तौं पिय ! पाइमाल जाहिगो ॥२३॥
'( उनके ) दूत बाँके वीर पवनपुत्रको तुमने देखा जो लंका-
जैसे दुर्गम गढ़को धक्केसे ढकेलकर ही ढाह गया । बलशाली