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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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७४ लंकाकाण्ड
रे नीच ! मारीचु बिचलाइ, हति ताड़का,
भंजि सिवचापु सुखु सबहि दीन्ह्यो ।
सहस दसचारि खल सहित खर-दूषनहि,
पठै जमधाम, तैं तउ न चीन्ह्यो ॥
मैं जो कहौं, कंत ! सुनु मंतु, भगवंतसों
बिमुख है बालि फलु कौन लीन्ह्यो ।
बीस भुज, दस सीस खीस गए तबहिं जब,
ईसके ईससों बैरु कीन्ह्यो ॥१८॥
अरे नीच ! जिसने मारीचको विचलितकर (अर्थात् बिना
फलके बाणसे समुद्रके पार फेंककर) ताड़काको मार डाला, शिवजीके
धनुषको तोड़कर सबको सुख दिया और फिर चौदह हजार राक्षसों-
सहित खर-दूषणको यमलोक भेज दिया, उसे तूने तब भी नहीं
पहचाना । हे स्वामिन् ! मैं जो सलाह देती हूँ सो सुनो । भगवान्‌से
विमुख होकर भला बालिने भी कौन फल पाया ? तुम्हारे बीसों बाहु
और दसों सिर तो तभी नष्ट हो गये जब तुमने शिवजीके स्वामीसे
वैर किया ।
बालि दलि, काल्हि जलजान पाषान किये,
कंत ! भगवंतु तैं तउ न चीन्हे।
विपुल बिकराल भट भालु-कपि काल-से,
संग तरु तुंग गिरिस्रंग लीन्हें॥
आइगो कोसलाधीसु तुलसीस जँहि
छत्र मिस मौलि दस दूरि कीन्हे।