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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 228 में से

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पृष्ठ 38

३५ अयोध्याकाण्ड
यदि संसार हमलोगोंको खोटा भी कहेगा तो कुछ परवा नहीं !
नेत्र तो अपना फल पा जायँगे और कान इनकी सुन्दर बातोंको
सुनकर सुख पावेंगे । ( हमसे नहीं तो ) आपसमें तो अवश्य ही
कुछ कहेंगे ही।' गोसाईंजी कहते हैं, अत्यन्त प्रेमसे उनकी आँखें
बंद हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें देखकर वे पुलकित
हो गयीं ।
पद कोमल, स्यामल-गौर कलेवर राजत कोटि मनोज लजाएँ ।
कर बान-सरासन, सीस जटा, सरसीरुह-लोचन सोन सुहाए ॥
जिन्ह देखे सखी ! सतिभायहु तें तुलसी तिन्ह तौ मन फेरि न पाए
एहिं मारग आजु किसोर बधू बिधुबैनी समेत सुभायँ सिधाए।२४।
[ वे दूसरी स्त्रियोंसे कहने लगीं— ] अरी सखि ! आज एक
चन्द्रवदनी बालाके सहित दो कुमार स्वभावसे ही इस मार्गसे गये
हैं। उनके चरण बड़े कोमल थे तथा श्याम और गौर शरीर करोड़ों
कामदेवोंको लज्जित करते हुए सुशोभित हो रहे थे । उनके हाथमें
धनुष-बाण थे, सिरपर जटाएँ थीं तथा कमलके समान अरुणवर्ण
नेत्र बड़े ही शोभायमान थे । जिन्होंने उन्हें सद्भावसे भी देख लिया,
वे फिर उनकी ओरसे अपने मनको नहीं लौटा सके ।
मुखपंकज, कंजबिलोचन मंजु, मनोज-सरासन-सी बनीं भौंहैं ।
कमनीय कलेवर कोमल स्यामल-गौर किसोर, जटा सिर सोहैं ॥
तुलसी कटि तून, धरें धनु-बान, अचानक दिष्टि परी तिरछौंहैं ।
केहि भाँति कहौं सजनी ! तोहि सों, मृदु मूरति द्वै निवसीं मन मोहैं