कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१५ उत्तरकाण्ड
फलैं फूलैं फैलैं खल, सीदैं साधु पल-पल
खाती दीपमालिका, ठठाइयत सूप हैं ॥१७१॥
काशीका महत्त्व लोक और वेद दोनोंमें प्रसिद्ध है। यहाँके
निवासी श्रीशङ्कर और पार्वतीरूप हैं। कालभैरव-जैसे तो यहाँके
कोतवाल हैं, दण्डपाणि भैरव-जैसे दण्ड देनेवाले जज हैं तथा
गणेशजी-जैसे अनेकों अनुपम सभासद् हैं। किन्तु कुचाली कलियुगने
वहाँ भी अपनी कुचेष्टा नहीं छोड़ी ! अथवा वह मूर्ख जानता नहीं
कि यहाँके राजा साक्षात् भूतनाथ हैं। आजकल सब बातें उल्टी
देखनेमें आती हैं; दुष्ट लोग तो खूब फलते, फूलते और फैलते हैं
तथा साधुजन पल-पलमें दुःख उठाते हैं; जैसे कहावत है—घी तो
खाय दीपमालिका और दूसरे दिन ठोंका जाता है सूप ।
पंचकोस पुन्यकोस स्वारथ-परारथको
जानि आपु आपने सुपास वास दियो है।
नीच नर-नारि न सँभारि सके आदर,
लहत फल कादर विचारि जो न कियो है।
बारी बारानसी बिनु कहे चक्रपानि चक्र,
मानि हितहानि सो मुरारि मन भियो है।
रोसमें भरोसो एक आसुतोस कहि जात
बिकल बिलोकि लोक कालकूट पियो है ॥१७२॥
पाँच कोसके बीचमें बसा हुआ काशीक्षेत्र पुण्यका खजाना
और स्वार्थ-परमार्थ दोनोंका साधक है—यह जानकर आपने यहाँके