कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीछे लग गया है, जिसके कारण इस तुलसीदासको बड़ा कष्ट
हो रहा है । अतः हे भूतनाथ ! आप रक्षा कीजिये, मैं आपके
चरणकमल पकड़ता हूँ । यदि मुझे जिलाना है तो जानकीवल्लभ-
का दास जानकर जिलाइये और यदि मारना है तो आपसे साफ़-
साफ़ कहता हूँ मुझे मुँहमाँगी मौत दीजिये [ अर्थात् मृत्यु तो
मैं स्वयं भी माँगता हूँ; वह मुझे प्रसन्नतापूर्वक दीजिये ] ।
भूतभव ! भवत पिसाच-भूत-प्रेत-प्रिय,
आपनो समाज सिव आपु नीकें जानिये ।
नाना वेष, वाहन, विभूषन, बसन, वास,
खानपान बलि-पूजा-विधि को बखानिये ॥
रामके गुलामनिकी रीति, प्रीति सूधी सब,
सबसों सनेह, सबहीको सनमानिये ।
तुलसीकी सुधरै सुधारै भूतनाथहीके
मेरे माय बाप गुरु संकर-भवानिये ॥१६८॥
हे पञ्च महाभूतोंके कारणस्वरूप शिवजी ! आपको भूत,
प्रेत एवं पिशाच प्रिय हैं, आप अपने समाजको अच्छी तरह
जानते हैं । उनके वेष, वाहन, आभूषण, वस्त्र, निवासस्थान,
खान-पान, बलि और पूजाविधि अनेक प्रकारके हैं, उनका कौन
वर्णन कर सकता है ? रामके दासोंका व्यवहार और प्रेम तो
सीधा-सादा होता है, वे सभीसे प्रेम रखते हैं और सभीका
सम्मान करते हैं । [ अतः मेरे व्यवहारसे मेरा सम्मान बढ़ा
देखकर जो भैरवजीने मुझे दण्ड दिया है, उसमें मेरा क्या अपराध
है ? ] अब तुलसीदासकी बात तो श्रीभूतनाथके सुधारनेसे ही