सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 213
  • कवितावली
    २१०
    सेवन करता हूँ तथा रामके नामपर टुकड़े माँगकर पेट भरता
    हूँ । यह तुलसी कुछ देने योग्य नहीं है, तो किसीका कुछ लेता
    भी नहीं; भलाई तो मेरे भाग्यमें ही नहीं लिखी, परन्तु मैं कोई
    बुराई भी नहीं करता । इतनेपर भी यदि कोई व्यक्ति आपका
    भक्त कहलाकर भी मुझसे बलात्कार करता है तो उसका वह
    बलप्रयोग दीन होकर आपके द्वारपर निवेदन कर देता हूँ । हे
    काशीनाथ ! [ मेरे प्रभु श्रीरघुनाथजीसे ] उलाहना पाकर मुझे
    उलाहना मत देना [ कि तुमने मुझे अपने कष्टकी सूचना क्यों
    नहीं दी ] । इसलिये मैं कालकी करतूत आपसे कहकर छुट्टी
    लेता हूँ ।*
    चेरो रामराइको, सुजस सुनि तेरो, हर !
    पाइ तर आइ रह्यौँ सुरसरितीर हौं ।
    बामदेव ! रामको सुभाव-सील जानियत
    नातो नेह जानियत रघुवीर भीर हौं ॥
    अधिभूत बेदन विषम होत, भूतनाथ !
    तुलसी बिकल, पाहि ! पचत कुपीर हौं ।
    मारिये तौ अनायास कासीबास खास फल,
    ज्याइये तौ कृपा करि निरूजसरीर हौं ॥१६६॥
    हे शङ्कर ! मैं महाराज रामका दास हूँ, आपका सुयश
    सुनकर आपके चरणोंमें श्रीगङ्गाजीके तटपर आ बसा हूँ । हे
  • गोसाईंजीकी बढ़ती हुई प्रतिष्ठा देखकर काशीके बहुत-से विद्वानों-
    को सहन नहीं हुई । वे लोग तरह-तरहसे उन्हें कष्ट पहुँचानेका प्रयत्न करने
    लगे । उस समय गोसाईंजीने यह कवित्त रचकर श्रीमहादेवजीके यहाँ
    फ़रियाद की ।