कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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- कवितावली
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सेवन करता हूँ तथा रामके नामपर टुकड़े माँगकर पेट भरता
हूँ । यह तुलसी कुछ देने योग्य नहीं है, तो किसीका कुछ लेता
भी नहीं; भलाई तो मेरे भाग्यमें ही नहीं लिखी, परन्तु मैं कोई
बुराई भी नहीं करता । इतनेपर भी यदि कोई व्यक्ति आपका
भक्त कहलाकर भी मुझसे बलात्कार करता है तो उसका वह
बलप्रयोग दीन होकर आपके द्वारपर निवेदन कर देता हूँ । हे
काशीनाथ ! [ मेरे प्रभु श्रीरघुनाथजीसे ] उलाहना पाकर मुझे
उलाहना मत देना [ कि तुमने मुझे अपने कष्टकी सूचना क्यों
नहीं दी ] । इसलिये मैं कालकी करतूत आपसे कहकर छुट्टी
लेता हूँ ।*
चेरो रामराइको, सुजस सुनि तेरो, हर !
पाइ तर आइ रह्यौँ सुरसरितीर हौं ।
बामदेव ! रामको सुभाव-सील जानियत
नातो नेह जानियत रघुवीर भीर हौं ॥
अधिभूत बेदन विषम होत, भूतनाथ !
तुलसी बिकल, पाहि ! पचत कुपीर हौं ।
मारिये तौ अनायास कासीबास खास फल,
ज्याइये तौ कृपा करि निरूजसरीर हौं ॥१६६॥
हे शङ्कर ! मैं महाराज रामका दास हूँ, आपका सुयश
सुनकर आपके चरणोंमें श्रीगङ्गाजीके तटपर आ बसा हूँ । हे
- गोसाईंजीकी बढ़ती हुई प्रतिष्ठा देखकर काशीके बहुत-से विद्वानों-
को सहन नहीं हुई । वे लोग तरह-तरहसे उन्हें कष्ट पहुँचानेका प्रयत्न करने
लगे । उस समय गोसाईंजीने यह कवित्त रचकर श्रीमहादेवजीके यहाँ
फ़रियाद की ।