सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

कवितावली १८
परन्तु शिवजीका जो धनुष टूट गया वह तो अब जुड़ नहीं
सकेगा । इस धनुषमें तो आपका कोई हिस्सा भी नहीं था [ जो
आप इतना क्रोध करते हैं ] ।
गर्भके अर्भक काटनकौं पटु धार कुठारु कराल है जाको ।
सोई हौं बूझत राजसभा 'धनु को दल्यौ' हौं दलिहौं बलु ताको ॥
लघु आनन उत्तर देत बड़े लरिहैं मरिहै करिहै कछु साको ।
गोरो गरूर गुमान भर्यौ कहौ कौसिक छोटो-सो ढोटो है काको ॥
[ तब परशुरामजी बोले--] जिसके भयङ्कर कुठारकी धार
गर्भके बालकोंको भी काटनेमें कुशल है वही मैं इस राजसभामें
पूछता हूँ कि किसने इस धनुषको तोड़ा है ? उसके बलको मैं
नष्ट करूँगा । छोटे मुँहसे बड़े-बड़े उत्तर देता है ! क्या लड़-मरकर
कुछ नाम करेगा ? हे कौशिक ! यह गोरा और घमण्ड-गुमानसे भरा
हुआ छोटा-सा लड़का किसका है ?
मखु राखिबेके काज राजा मेरे संग दए,
दले जातुधान जे जितैया बिबुधेसके ।
गौतमकी तीय तारी, मेटे अघ भूरि भार,
लोचन-अतिथि भए जनक जनेसके ॥
चंड बाहुदंड-बल चंडीस-कोदंडु खंड्यौ,
ब्याही जानकी, जीते नरेस देस-देसके ।
साँवरे-गोरे सरीर धीर महाबीर दोऊ,
नाम रामु लखनु कुमार कोसलेसके ॥२१॥