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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली
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स्वभावसे ही परम पवित्र श्रीगङ्गाजी विराजमान हैं, जो कल्याण-
स्वरूप, कामना-शून्य और सौन्दर्यधाम हैं तथा जिनकी रामनाममें
नित्य रुचि है, कामदेवके दुर्गम दर्पका दमन करनेवाले उन
उमारमण गुणमन्दिर पापापहारी त्रिपुरारि त्रिनयन त्रिगुणातीत
त्रिपुरविदारण देवेश्वरकी जय हो, जय हो ।
अरध अंग अंगना, नाम जोगीस, जोगपति ।
विषम-असन, दिगवसन, नाम विस्वेसु, विस्वगति ॥
कर कपाल, सिर माल ब्याल, विष-भूति-विभूषन ।
नाम सुद्ध, अविरुद्ध, अमर, अनवद्य, अनूपन ॥
बिकराल-भूत-बेताल-प्रिय भीम नाम, भवभयदमन ।
सब बिधि समर्थ, महिमा अकथ, तुलसिदास-संसय-समन ॥
अहो ! जिनके अर्द्धाङ्गमें पार्वतीजी रहती हैं, परन्तु जिनका
नाम योगीश्वर अथवा योगपति है, जिनका भाँग-धतूरा आदि
विषम भोजन तथा दिशाएँ ही वस्त्र हैं, किन्तु जो विश्वेश्वर और
विश्वके आश्रयस्थान कहलाते हैं; जिनके हाथमें कपाल, सिरपर
सर्पोंकी माला और शरीरमें हालाहल विष और भस्मकी ही शोभा
है, किन्तु जिनका नाम शुद्ध, अविरुद्ध, अमर, अमल और निर्दोष
है; जिनका विकराल-भूत-वेताल-प्रिय ऐसा भयङ्कर नाम है किन्तु
जो भव-भयका नाश करनेवाले हैं, तुलसीदासजी कहते हैं—वे
महादेवजी सब प्रकार समर्थ हैं, उनकी महिमा अकथनीय है
और वे मेरे सन्देहोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं ।
भूतनाथ मयहरन भीम मयभवन भूमिधर ।
भानुमंत भगवंत भूतिभूषन भुजंगबर ॥