कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १३०
विगरतैं आपु ही सुधारि लीजै भाय जू ॥
मेरी साहिबिनी सदा सीसपर बिलसति
देवि क्यों न दासको देखाइयत पाय जू ।
खीझहूमैं रीझिबेकी बानि, सदा रीझत हैं,
रीझे ह्वैहैं, रामकी दोहाई, रघुराय जू ॥ १३६ ॥
हे श्रीहनुमान्जी ! हे लड़िले लखनलाल ! हे मनभावन
भरतजी ! तनिक कृपाकर इस सेवककी सहायता कीजिये। यह
दीन, दुर्बल और दयापात्र दास आपसे विनय करता है; इससे
यदि कोई भाव बिगड़ जाय तो आप ही सुधार लें। मेरी स्वामिनी
सदा मेरे मस्तकपर विराजमान रहती हैं; सो हे देवि ! आप
भी इस दासको अपने चरणोंका दर्शन क्यों नहीं करातीं ? हमारे
प्रभुका तो खीझनेमें भी रीझनेका स्वभाव है; वे तो सदा ही
प्रसन्न रहते हैं। अतः रामकी दुहाई, इस समय भी श्रीरघुनाथजी
अवश्य रीझे होंगे।
बेषु विरागको, राग भरो मनु, माय ! कहौं सतिभाव हौं तोसों ।
तेरे ही नाथको नामु लै वेचि हों पातकी पाँवर प्राननि पोसों ॥
एते बड़े अपराधी अघी कहूँ, तैं कहु, अंब ! कि मेरो तूँ, मोसों ।
स्वारथको परमारथको परिपूरन भो, फिरि घाटि न होसों ॥
माताजी ! मैं तुमसे ठीक-ठीक कहता हूँ, मेरा वेष तो
वैराग्यका-सा है किन्तु मन रागसे भरा हुआ है। तुम्हारे ही स्वामी-
का नाम बेचकर (अर्थात् रामके नामपर भीख माँगकर) मैं इन
पापी पामर प्राणोंका पोषण करता हूँ। इतने बड़े अपराधी और
पापीसे, हे मातः ! तू यह कह दे कि 'तू मेरा है और मुझसे