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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 228 में से

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पृष्ठ 191

कवितावली १८८
[ श्रीकृष्णचन्द्रके मथुरा पधार जानेपर उनकी वियोग-
व्यथासे पीड़ित कोई व्रजबाला योग सिखाने आये हुए भगवान्‌के
प्रिय सखा उद्धवजीको भ्रमरके व्याजसे कहती है—] हे भ्रमर !
जिस समय मेरे नेत्रोंने इस ठगिया श्यामसुन्दरसे प्रीति जोड़ी
थी उसी समय एक चतुर सखीने मुझे बलपूर्वक रोका था।
किन्तु मैं नहीं जानती थी कि आगे इसमें वियोग-जैसा रोग
निकलेगा; इसलिये उस समय मैं उसपर नाराज हुई और उसका
तिरस्कार किया । अब नेह लगानेसे मेरी देह मानो वस्त्र हो
गयी है, उसे विरहरूपी दर्जी ब्योंत रहा है और हे भृंग ! सुन,
उस व्रजराजदुलारेके बिना काम मेरे जीका ग्राहक हो गया है।
जोग-कथा पठई व्रजको, सब सो सठ चेरीकी चाल चलाकी ।
ऊधौ जू ! क्यों न करै कुबरी, जो बरी नटनागर हेरि हलाकी ॥
जाहि लगै परि जाने सोई, तुलसी सो सोहागिनि नंदउलाकी ।
जानी है जानपनी हरिकी, अब बाँधियैगी कठु मोटि कऊाकी १३४
हे उद्धवजी ! व्रजको जो यह योगका सन्देश भेजा गया है
वह सब उस दुष्ट दासीकी चालाकीभरी चाल है । अब भला,
कुबड़ी ऐसा क्यों न करेगी, जिसे घातक श्रीकृष्णने खोजकर
वरण किया है । विरहकी आग कैसी होती है यह तो वही जान
सकती है जिसे वह लगती है; आज कुब्जा तो नन्दनन्दनकी
सुहागिन बनी हुई है [ उसे हमारी पीरका क्या पता ? ] किन्तु
इससे हमें श्यामसुन्दरकी बुद्धिमानीका पता लग गया [ उन्हें
कूबड़ बहुत पसंद है, इसलिये ] अब हम भी पीठपर बनावटी
मोटरी बाँधा करेंगी [ जिससे कुबड़ी दिखायी दिया करें ] ।