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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 228 में से

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पृष्ठ 185

कवितावली १८२

समझकर सकुचाता हूँ। इस समय सारा संसार एक-सा हो रहा है
[सभी मेरी निन्दा करनेवाले हैं] और आप त्रिलोकीनाथ होकर भी
लोकके अधीन हैं। किन्तु मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, मैं तो प्रभुके
सोचने हीं सूखा जाता हूँ [कि कहीं लोग यह न कहने लगें कि
रामजी भी कलियुगमें अपना स्वभाव छोड़कर करुणारहित हो गये]।

प्रभुकी महत्ता और दयालुता

तौलौं लोभ लोलुप ललात लालची लवार,
बार-बार लालचु धरनि-धन-धामको।
तवलौं वियोग-रोग-सोग, भोग जातनाको
जुग सम लागत जीवनु जाम-जामको॥
तौलौं दुख-दारिद दहत अति नित तनु
तुलसी हैं किंकरु बिमोह-कोह-कामको।
सब दुख आपने, निरापने सकल सुख,
जौलौं जनु भयो न बजाइ राजा रामको ॥१२४॥

जबतक तुलसीदास राजा रामका खुल्लमखुल्ला दास नहीं
हो जाता तभीतक वह लोभके कारण लोलुप, लालची और वाचाल
बना हुआ टुकड़े-टुकड़ेके लिये लालायित रहता है; और पृथ्वी, धन
एवं गृह आदिके लिये बार-बार ललचाता रहता है, तभीतक उसे वियोग
और रोगका शोक रहता है, तभीतक उसे यातना भोगनी पड़ती
है और तभीतक उसे पल-पलका जीवन युगके समान जान पड़ता है;
तभीतक उसका शरीर दुःख और दरिद्रताके कारण सर्वदा अत्यन्त
जलता रहता है और तभीतक वह मोह, क्रोध और कामका