कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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और आपने ऐसे दगाबाजको भी अङ्गीकार कर लिया। हे दशरथ-
नन्दन ! आपके समान कोई दूसरा समर्थ स्वामी अथवा दयालु
देव नहीं है; अपने शरणागतकी लज्जा रखनेवाले तो आप ही हैं।
महाबली बालि दलि, कायर सुकंठ कपि
सखा किए महाराज ! हो न काहू कामको।
भ्रात-घात-पातकी निसाचर सरन आएँ,
कियो अंगीकार नाथ ! एते बड़े बामको॥
राय दसरथके ! समर्थ तेरे नाम लिएँ,
तुलसी-से क्रूरको कहत जगु रामको।
आपने निवाजेकी तौ लाज महाराजको
सुभाउ, समुझत मनु मुदित गुलामको ॥१४॥
हे महाराज ! आपने महाबलवान् बालिको मारकर कायर
सुग्रीवको मित्र बनाया, जो किसी कामका नहीं था। भाईको धोखा
देनेका पाप करनेवाले राक्षसको शरण आनेपर-इतना प्रतिकूल
होते हुए भी-स्वीकार कर लिया। हे महाराज दशरथके समर्थ
सपूत ! तुम्हारा नाम लेनेसे आज तुलसी-जैसे कपटीको भी लोग
रामका कहते हैं। अपने अनुगृहीत दासकी लाज रखना तो महाराज-
का स्वभाव ही है, यह समझकर सेवकका मन आनन्दित होता है।
रूप-सीलसिंधु, गुनसिंधु, बंधु दीनको,
दयानिधान, जानमनि, बीरबाहु-बोलको।
स्राद्ध कियो गीधको, सराहे फल सबरीके,
सिला-साप-समन, निबाह्यो नेहु कोलको ॥