कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ११०
दससीस-बिरोध सभीत विभीषनु भूपु कियो, जग लीक रही ।
करुनानिधिको भजु, रे तुलसी ! रघुनाथु अनाथके नाथु सही १०
(भगवान् रामने) ऋषि (गौतम) की पत्नी (अहल्या)
का उद्धार किया और दुष्ट केवटको मित्र बनाकर पवित्र कर दिया,
और इस प्रकार सुकीर्ति प्राप्त की; शबरी और गीधको अपना लोक
दिया और सुग्रीवको राज्यपर स्थापित किया, सो सबको मालूम ही
है; रावणके विरोधसे डरे हुए विभीषणको राजा बनाया जिससे
उनकी कीर्ति संसारभरमें छा गयी । गोसाईंजी कहते हैं 'अरे
तुलसीदास ! करुणानिधि (श्रीरामचन्द्र) को भज, वे अनाथोंके
सच्चे स्वामी हैं।'
कौसिक, विप्रबधू, मिथिलाधिपके सब सोच दले पल माहैं ।
वालि-दसानन-बंधु-कथा-सुनि, सत्रु सुसाहेव-सीलु सराहैं ॥
ऐसी अनूप कहैं तुलसी रघुनायककी अगनी गुनगाहैं ।
आरत, दीन, अनाथनको रघुनाथु करैं निज हाथकी छाँहैं ॥११॥
(श्रीरघुनाथजीने) विश्वामित्र, ऋषिपत्नी (अहल्या) और
मिथिलापति (महाराज जनक) की सभी चिन्ताओंको पलभरमें हर
लिया । बालि और रावणके भाई (सुग्रीव और विभीषण) की कथा
सुनकर शत्रु भी हमारे श्रेष्ठ स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) के शीलकी
सराहना करते हैं । गोसाईंजी श्रीरघुनाथजीकी ऐसी अगणित अनुपम
गुणगाथाएँ कहते हैं । आर्त्त, दीन और अनाथोंको रघुनाथजी अपने
हाथकी छाया-तले कर लेते हैं ।
तेरे बेसाहें बेसाहत औरनि, और बेसाहि कै बेचनहारे ।
ब्योम, रसातल भूमि भरे नृप कूर, कुसाहेब सेंतिहुँ खारे ॥