कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १०६
रावणके यहाँ ब्रह्माजी ( स्वयं ) वेदपाठ करते थे और शिवजी
भयवश नित्यपूजन करानेके लिये आते थे तथा दैत्य और देवगण
दुखी, दीन एवं दयापात्र होकर उसे प्रतिदिन दूरहीसे सिर नवाते
थे । ऐसा भाग्य भी, जिसकी प्रभुता कवि-कोविद गाते हैं, उस
रावणको छोड़कर भाग गया । श्रीरामचन्द्रसे विमुख होनेपर सारी
सुख-सम्पदाएँ उस वामसे विमुख हो जाती हैं ।
बेदबिरुद्ध मही, मुनि, साधु ससोक किए, सुरलोकु उजारो ।
और कहा कहाँ, तीय हरी, तबहूँ करुनाकर कोपु न धारो ॥
सेवक-छोह तें छाड़ी छमा, तुलसीं लख्यो राम ! सुभाउ तिहारो।
तौलौं न दापु दल्यो दसकंधर, जौलौं बिभीषन लातु न मारो ॥३॥
वेदविरुद्ध आचरण करनेवाले रावणने पृथ्वी, मुनिगण और
साधुओंको शोकयुक्त कर दिया तथा देवलोकको उजाड़ डाला और
कहाँतक कहें, उसने ( उनकी ) स्त्रीतकको चुरा लिया, तब भी
करुणाकर ( प्रभु ) ने उसपर क्रोध नहीं किया । गोसाईंजी कहते
हैं कि हे श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका स्वभाव जान लिया; आपने
सेवक ( विभीषण ) के स्नेहवश ही ( अपनी स्वाभाविक ) क्षमाको
छोड़ा; क्योंकि जबतक रावणने विभीषणको लात नहीं मारी तबतक
आपने उसके दर्पको चूर्ण नहीं किया ।
सोकसमुद्र निमज्जत काढ़ि कपीसु कियो, जगु जानत जैसो ।
नीच निसाचर बैरिको बंधु बिभीषनु कीन्ह पुरंदर-कैसो ॥
नाम लिएँ अपनाइ लियो तुलसी-सो, कहौ, जग कौन अनैसो ।
आरत-आरति-भंजन रामु, गरीबनेवाज न दूसरो ऐसो ॥४॥