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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली ९८
सुभट-सरीर नीरचारी भारी-भारी तहाँ,
सूरनि उछाहू, कूर-कादर डरत हैं।
फेकारि-फेकारि फेरु फारि-फारि पेट खात,
काक-कंक बालक कोलाहलु करत हैं ॥४९॥
जहाँ-तहाँ लोथोंसे लोहूकी धाराएँ बह चलीं, मानो पर्वतोंसे
गेरूके झरने झर रहे हैं। लोहूकी भयंकर नदी बहने लगी; हाथी उस
नदीके भारी करारे हैं और घोड़े गिरते हुए ऐसे मालूम होते हैं
मानो किनारेके वृक्ष जड़सहित उखड़कर पड़ रहे हैं। वीरोंके शरीर
उस नदीके बड़े-बड़े जलजन्तु हैं। उस दृश्यको देखकर शूरवीरोंको
तो बड़ा उत्साह होता है। किन्तु निकम्मे और कायर लोग डरते
हैं। सियार चिल्ला-चिल्लाकर पेट फाड़-फाड़कर खाते हैं और कौए,
गृध्र आदि बालकोंके समान कोलाहल कर रहे हैं।
ओझरीकी झोरी काँधें, आँतनि की सेल्ही बाँधें,
मूँड़के कमंडल खपर किएँ कोरि कै।
जोगिनीं झुंटुंग झुंड-झुंड बनीं तापसीं-सी
तीर-तीर बैठीं सो समर-सरि खोरि कै॥
श्रोनितसों सानि-सानि गूदा खात सतुआ-से,
प्रेत एक पिअत बहोरि घोरि-घोरि कै।
'तुलसी' बैताल-भूत साथ लिएँ भूतनाथु,
हेरि-हेरि हँसत हैं हाथ-हाथ जोरि कै ॥५०॥
कंधेपर पेटकी पचौनी*की झोली लिये, अँतड़ियोंकी सेल्ही
(गंडा) बाँधे और खोपड़ीके कमण्डलुको खुरचकर खप्पर बनाये

  • पेटके भीतरकी वह थैली जिसमें भोजन रहता है।