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सर्वकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 918 में से

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पृष्ठ 407
प्रकरण ७२-७३दत्तस्यानपाकर्म, अस्वामिविक्रयः,
अध्याय १६स्वस्वामिसम्बन्धश्च

(१) दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम् ।
(२) दत्तमव्यवहार्यमेकत्रानुशये वर्तेत । सर्वस्वं पुत्रदारमात्मानं प्रदा-
यानुशयिनः प्रयच्छेत् । धर्मदानमसाधुषु, कर्मसु चौपघातिकेषु वा । अर्थ-
दानमनुपकारिषु अपकारिषु वा । कामदानमनर्हेषु च । यथा च दाता
प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः ।
(३) दण्डभयादाक्रोशभयादनर्थभयाद्वा भयदानं प्रतिगृह्णतः स्तेयदण्डः ।
प्रयच्छतश्च । रोषदानं परहिंसायाम् । राज्ञामुपरि दर्पदानं च । तत्रोत्तमो
दण्डः ।


दान किये हुए धन को न देना, अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि संबंध

(१) दान किये हुए धन को न देना, कर्जा न देने के समान ही समझना चाहिए ।

(२) दान किया हुआ धन यदि उपयोग में लाने के योग्य न हो तो उसे अमा-
नत (अनुशय) के तौर पर सुरक्षित रखा जाय । दाता को चाहिए कि वह अपनी
सारी संपत्ति, स्त्री, पुत्र, कलत्र आदि, यहाँ तक कि अपने आप को भी गिरवी रख-
कर दान पाने वाले (अनुशयी) का धन चुकता करे । धर्मबुद्धि से अनजाने में असा-
धुओं को दान में दिया हुआ धन; या सद्बुद्धि से अच्छे कार्य के लिए बुरे व्यक्तियों
को दान में दिया हुआ धन; अनुपकारी तथा अपकारी को दान में दिया हुआ धन; और
काम-तृप्ति के लिए वेश्या आदि को दिया हुआ धन अमानत (अनुशय) के तौर पर
सुरक्षित रखा जाय । कुशल धर्मस्थ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अनुशय का इस
प्रकार निर्णय करें, जिससे दाता और प्रतिगृहीता, दोनों को किसी प्रकार की
हानि न हो ।

(३) जो भी व्यक्ति दण्ड, निंदा और रोग आदि के भय से दान दें तथा दान
लें, उन सब को चोरी का दण्ड दिया जाय । दूसरे को मारने की नीयत से दान
देने और दान लेने वाले व्यक्तियों को भी यही दण्ड दिया जाय । यदि कोई व्यक्ति
किसी कार्य में अभिमानवश राजा से अधिक दान दे तो उसे उत्तम साहस दण्ड
दिया जाय ।