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सर्वकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

प्र० १२ : अ० १६ ] राजपुत्रों से राजा की रक्षा ५७

(१) स यद्येकपुत्रः पुत्रोत्पत्तावस्य वियतेत । पुत्रिकापुत्रानुत्पादयेद्वा । वृद्धस्तु व्याधितो वा राजा मातृबन्धुकुल्यगुणवत्सामन्तानामन्यतमेन क्षेत्रे बीजमुत्पादयेत् । न चैकपुत्रमविनीतं राज्ये स्थापयेत् ।

(२) बहूनामेकसंरोधः पिता पुत्रहितो भवेत् ।
अन्यत्रापद ऐश्वर्यं ज्येष्ठभागि तु पूज्यते ॥

(३) कुलस्य वा भवेद्राज्यं कुलसङ्घो हि दुर्जयः ।
अराजव्यसनाबाधः शश्वदावसति क्षितिम् ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे राजपुत्ररक्षणं नाम षोडशोऽध्यायः ॥

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किन्तु तदनुसार अपना आचरण नहीं बना पाता उसे 'आहार्यबुद्धि' कहते हैं । जो बुराइयों में लीन तथा धर्म और अर्थ से द्वेष रखता है वह 'दुर्बुद्धि' है ।

( १ ) यदि राजा का एक ही पुत्र हो और वह भी दुर्बुद्धि निकले तो राजा उस दुर्बुद्धि राजकुमार से ऐसा पुत्र पैदा कराने का यत्न करे, जो राजा बनने के योग्य हो । यदि ऐसा भी संभव न हो तो अपनी पुत्री के पुत्र को राज्य का उत्तराधिकार सँभालने के योग्य बनाये । यदि राजा बूढ़ा हो गया हो, या सदैव रुग्ण ही रहता हो, तो अपने किसी ममेरे भाई अथवा अपने ही कुल के किसी बंधु से या किसी गुणवान सामंत से अपनी स्त्री में नियोग कराकर पुत्र पैदा करवावे । किन्तु अयोग्य अशिक्षित पुत्र को राज्यभार न सौंपे ।

( २ ) यदि अनेक पुत्रों में एक पुत्र दुर्बुद्धि हो तो उसे किसी दूसरे देश में भेज कर रोक रखे । वैसे राजा को चाहिए कि सर्वदा ही वह अपने पुत्रों की कल्याण-कामना करता रहे । यदि सभी पुत्र राजा को एक समान प्रिय हों, तो उस अवस्था में वह ज्येष्ठ पुत्र को ही राजा बनावे ।

( ३ ) अथवा वे सभी भाई मिलकर राज्य को सँभालें, क्योंकि यदि राज्य का संचालन सामुदायिक ढंग से हुआ तो निश्चित ही वह राज्य दुर्जय होता है । सामुदायिक राज्य-व्यवस्था से एक बड़ा लाभ यह भी है कि एक व्यक्ति के व्यसनग्रस्त हो जाने पर दूसरे व्यक्ति उसके कार्य को सँभाल लेते हैं और इस प्रकार सर्वदैव प्रजा की सुखमय अवस्था पृथ्वी पर बनी रहती है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में राजपुत्ररक्षण नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त ।

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