कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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कं. सूत्र पृष्ठ
३५-२८ पुंसवन संस्कार, जम्भुआ पकड़े का इलाज स्त्री वशीकरण । ८२-८५
३६-४० स्त्री पुरुषके सम्भोगमें विघ्ननाशक कर्म । स्त्री को सोला देने ८५-८८
का कर्म । भागने वाली को बन्धन कर्म । स्त्री एवं पति के
कोप शान्ति का विधान ।
अध्याय ॥ ५ ॥
३७-१२ लाभ, हानि, जीत, हार, सुख, दुःख, उत्कर्ष, अपकर्ष, ८८-९०
सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, भय, अभय, रोग, अरोग, धनी, निर्धन, धर्म,
अधर्म, मरण अमरण, धान्य होगा ? खेत उपजेगा ? घर में
वास होगा ? इत्यादि संसारी प्रश्नों का उत्तर मिलेगा ।
३८-३० नैमित्तिक कर्म । बरसते मेघ को रोकना । खेत में बिजुली
पत्थरादि न गिरने पावे-इसका उपाय । अतिवृष्टि, अनावृष्टि,
फसलमें कीड़े हो जाना, चूहा, टिड्डी, शुक, स्वचक्र, परचक्र,
वृष्टि निवारण ।
३९-३१ अपनी रक्षा के लिये यंत्र बांधना। कृत्या ( जादू ) का वापस ९०-९३
करना या कृत्या को मुर्दा करदेना और नदी के प्रवाह को
जिस ओर चाहे घुमा देवे । पुरुष के वीर्य्य को बढ़ाना । शिश्न
को मोटा करना ।
४०-१८ वृष्टिकर्म विधि। जमीन में गड़े धन को उखाड़ने में विघ्ननाशनं ९३-९८
कर्म । धन के उपार्जन की सफलता ।
४१-२६ द्यूत में जीतना, विघ्नशान्ति कर्म । घोड़े की शान्ति । प्रवास ९८-१००
जाने में मार्ग में भयादि विघ्न की शान्ति । व्यापार की चीजों
को लेजाने के पहिले लाभार्थ कर्म करना ।
४२-२३ घरके विरोध में सांमनस्य कर्म । पापलक्षण वाली स्त्री को १००-१०३
देखने पर शान्ति कर्म ।
४३-२१ पुनर्विघ्नशमन । सर्प, शृङ्गी, दण्डादिका विघ्न नहीं होता ! १०३-१०५
अवसान, शाला कर्म ।
४४-४० वशा (बिनब्याई हुई गौ जो-कभी ब्याती नहीं) का १०५-१०८
प्रयोग ।
४५-१९ वशा जिस घर में रहती है उसकी शान्ति करनी । बुरे १०८-११०
स्वप्न देखने पर शान्ति, अवकोर्णी (भ्रष्ट ब्रह्मचारी) प्राय-