कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५५
इति द्यावापृथिव्यौ समीक्षते ॥४१॥ सविता प्रसवाना-
मिति कर्मणिकर्मण्यभितोऽभ्यातानैराज्यं जुहुयात्॥४२॥
व्याख्यातं सर्वपाकयज्ञियं तन्त्रम् ॥४३॥१॥१३७॥
अष्टकायामष्टकाहोमाञ्जुहुयात् ॥१॥ तस्या हवींषि
धानाः करम्भः शाष्कुल्यः पुरोडाश उदौदनः क्षीरौदनस्ति-
लौदनो यथोपपादिपशुः ॥२॥ सर्वेषां हविषां समुद्धृत्य
॥३॥ दर्व्या जुहुयात्प्रथमा ह व्युवास सेति पञ्चभिः
॥४॥ आयमागन्संवत्सर इति चतसृभिर्विज्ञायते ॥५॥
ऋतुभ्यस्त्वेति विग्राहमष्टौ ॥६॥ इन्द्रपुत्र इत्यष्टादशीम्
॥७॥ अहोरात्राभ्यामित्यूनविंशीम् ॥८॥ पशावुपपद्य-
माने दक्षिणं बाहुं निर्लोमं सचर्म सखुरं प्रक्षाल्य ॥९॥
इडायास्पदमिति द्वाभ्यां विंशीम् ॥१०॥ अनुपपद्यमान
आज्यं जुहुयात् ॥११॥ हविषां दर्वि पूरयित्वा पूर्णा दर्व
॥३९॥४०॥४१॥ “सविता प्रसवानां०” इत्यादि प्रत्येक कर्म में अभ्या-
तान मंत्रों से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥४२॥ सर्व पाकयज्ञिय तन्त्र
का व्याख्यान हुआ ॥४३॥१॥१३७॥ यह एकसौ सैंतीसवी कण्डिका
पूरी हुई ॥
अष्टकाओंमें अष्टकाहोमों की आहुतियाँ देवे ॥१॥ उसकी आहुति के
लिये धाना, करम्भ, पूरियाँ, पुरोडाश, जल में पका भात, क्षीरौदन, तिलौ-
दन यथोपपादि पशु ॥२॥ सब ही हवियों को निकालकर ॥३॥ दर्वी से
आहुतियाँ देवे “प्रथमा ह व्युवास०” इन पाँच ऋ० से आहुतियाँ करे
॥४॥ “आयमागन्संवत्सर०” इन चार से आहुतियाँ देनी जान पड़ती है
॥५॥ “ऋतुभ्यस्त्वा०” से भी आठ आहुतियाँ ॥६॥ “इन्द्रपुत्र०” इत्यादि
से अठारहवी ॥ ७ ॥ “अहोरात्राभ्यां०” से उन्नीसवी ॥ ८ ॥ यदि पशु
मिल जावे तो दहिने बाहु को लोम रहित, चर्म सहित, खुर सहित को
प्रक्षालन करके ॥ ९ ॥ “इडायास्पदं०” इन दो ऋ० से बीसवी आहुति
॥१०॥ यदि पशु न मिले तो आज्य की आहुति करे ॥११॥ हवियों में
दर्वी को डाल कर भर लेवे “पूर्णा दर्व०” से दर्वी सहित आहुति देवे ।