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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५१
ङ्गिता विकसति तत्र जुहुयात् ॥१॥ भूमिर्भूमिमवागा-
न्माता मातरमप्यगात्। ऋध्यास्म पुत्रैः पशुभिर्यो नो द्वेष्टि
स भिद्यतामिति ॥२॥ सदसि सन्मे भूयादिति सक्तू-
नावपेत् ॥३॥ अथ चेदोदनस्यानमस्यन्नं मे देह्यन्नं मा मा
हिंसीरिति त्रिः प्राश्य ॥४॥ अथ यथाकामं प्राश्नीयात्
॥५॥ अथ चेदुद्दधानः स्यात्समुद्रं वः प्रहिणोमीत्येताभ्या-
मभिमन्त्र्य ॥६॥ अन्यं कृत्वा ध्रुवाभ्यां दृंहयित्वा ॥७॥
तत्र हिरण्यवर्णा इत्युदकमासेचयेत् ॥८॥ स खल्वेतेषु
कर्मसु सर्वत्र शान्त्युदकं कृत्वा सर्वत्र चातनान्यनुयोजये-
न्मातृनामानि च ॥९॥ सर्वत्र वरां धेनुं कर्त्रे दद्यात् ॥१०॥
सर्वत्र कंसवसनं गौर्दक्षिणा ॥११॥ ब्राह्मणान् भक्तेनो-
पेप्सन्ति ॥१२॥ यथोद्दिष्टं चादिष्टेष्विति प्रायश्चित्तिः
प्रायश्चित्तिः ॥१३॥४४॥१३६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे
त्रयोदशोऽध्यायः समाप्तः ॥१३॥
अब जहां यज्ञ स्थान में कुम्भोद्धान, सक्तुधानी या उखा या
अनिङ्गिता विकसित हो वहां आहुति करे ॥१॥ “भूमिर्भूमि०” इत्यादि से
सक्तु को वपन करे (डाले) ॥२॥३॥ “अथ चेदोदनस्यानं०”
इत्यादि से तीन वार प्राशन करके ॥४॥ फिर यथेच्छ प्राशन करे ॥५॥
“अथ चेदुद्दधानः स्यात्०” इत्यादि दो ऋचाओं से अभिमंत्रण करके
॥६॥ दूसरे को बनाकर ध्रुवों से दृंहण करके ॥७॥ “हिरण्यवर्णा०” से
जल का सेक करे ॥८॥ यह इन कर्मों में सर्वत्र शान्ति जल का प्रयोग
करके सर्वत्र चातनों का अनुयोजन करे और मातृनामों को भी ॥९॥
सबही स्थान में सब लोग श्रेष्ठ धेनु कर्त्ता को देवें ॥१०॥ सर्वत्र कटोरा,
कपड़ा, और गौ दक्षिणा देवे ॥११॥ ब्राह्मणों को ओदन भोजन करावें
॥१२॥ जैसा कहा गया वैसा या बिन कहे कर्मों के लिये यह प्रायश्चित्ति
है ॥१३॥४४॥१३६॥ यह एक सौ छत्तीसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१३॥