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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २४७
नः प्रजां मनुष्यां संसृजन्ते ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥२॥
अग्नी रक्षांसि सेधतीति प्रायश्चित्तिः ॥३॥३६॥१३१॥
अथ यत्रैतत्सर्पिर्वा तैलं वा मधु वा विष्यन्दति
यद्यामं चक्रुर्निखनन्त इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ सा
तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥४०॥१३२॥
अथ यत्रैतद्ग्राम्योऽग्निः शालां दहत्यपमित्य-
मप्रतीत्तमित्येतैस्त्रिभिः सूक्तैर्मैश्रधान्यस्य पूर्णाञ्जलिं
हुत्वा ॥१॥ ममोभा मित्रावरुणा मह्यमापो मधुमदेरयन्ता-
मित्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥२॥ ममोभा मित्राव-
रुणा ममोभेन्द्राबृहस्पती । मम त्वष्टा च पूषा च ममैव
सविता वशे ॥ मम विष्णुश्च सोमश्च ममैव मरुतो
भवन् । सरस्वांश्च भगश्च विश्वेदेवा वशे मम ॥ ममो-
भा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं स्वर्मम । ममेमाः सर्वा
ओषधीरापः सर्वा वशे मम ॥ मम गावो ममाश्वा ममा-
जाश्वावयश्च ममैव पुरुषा भवन् । ममेदं सर्वमात्मन्वदे-
जत्प्राणद्वशे ममेति ॥३॥ अरणी प्रताप्य स्थण्डिलं परि-
कृष्णा०” इत्यादि आहुति करके ॥२॥ “अग्नी रक्षांसि०” से आहुति करे
यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥३९॥१३१॥ यह एकसौ एकतीसवी
कण्डिका खतम हुई ।
अब जहां घी, या तेल या मधु विष्यन्द करे तो “यद्यामं चक्रुर्निख-
नन्त०” इत्यादि सूक्त से आहुति करे ॥१॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥
॥२॥४०॥१३२॥ यह एकसौ बत्तीसवी कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहां ग्राम्य अग्नि अग्निशालाको दहन कर देवे । तहां “अप-
मित्यमप्रतीत्तं०” इत्यादि तीन सूक्तों से मैश्रधान्य की पूर्णाञ्जलि आहुति
करके ॥१॥ “ममोभा मित्रावरुणा०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥
॥२॥ “ममोभा मित्रा०” इत्यादि से ॥३॥ अरणी को तपा करके वेदि