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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

२४४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
र्णेन स्रुवेण रक्षोघ्नैश्च सूक्तैर्यामाहुस्तारकैषा विकेशी-
त्येतेन सूक्तेनाज्यं जुह्वन् ॥ ९ ॥ अवपतिते सम्पाताना-
नीय संस्थाप्य होमान् ॥ १० ॥ अवपतितं शान्त्युदकेन
सम्प्रोक्ष्य ॥११॥ ता एव ब्राह्मणो दद्यात् ॥१२॥ सीरं
वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्रामवरं राजा ॥१३॥ सा तत्र
प्रायश्चित्तिः ॥१४॥३४॥१२६॥
अथ यत्रैतद्धूमकेतुः सप्तर्षीनुपधूपयति तद्योगक्षे-
माशङ्कमित्युक्तम् ॥१॥ पञ्च पशवस्तायन्ते वारुणः कृष्णो
गौर्वाजो वाविर्वा हरिर्वायव्यो बहुरूपो दिश्यो मारुती
मेष्याग्नेयः प्राजापत्यश्च क्षीरौदनोऽपां नप्त्र उद्रः ॥२॥
उतेयं भूमिरिति त्रिर्वरुणमभिष्टूय ॥३॥ अप्सु ते राजन्नि-
ति चतसृभिर्वारुणस्य जुहुयात् ॥४॥ वायवा रुन्द्धि नो
मृगानस्मभ्यं मृगयद्वशः। स नो नेदिष्ठमा कृधि वातो हि
रशनाकृत इति वायव्यस्य ॥५॥ आशानामिति दिश्य-
अब उस नवनीत को सोने के पात्र में गलाकर धरे ॥ और सोने के
स्रुवा से रक्षोघ्न सूक्तों से “यामाहुस्तारकैषा विकेशी” इस सूक्त से
आज्य की आहुती देता हुआ । गिरे हुए संपातों को लाकर और होम
को संस्थापन करके ॥९॥१०॥ नीचे गिरे हुए सम्पात को शांति जल से
संप्रोक्षण करके ब्राह्मण को देवे ॥११॥१२॥ सीर को वैश्य देवे, घोड़े को
प्रादेशिक देवे और राजा ब्राह्मण को ग्राम देवे ॥१३॥ यह उसकी प्राय-
श्चित्ति है ॥१४॥३४॥१२६॥ यह एकसौ छब्बीसवी कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहां धूमकेतु अपने प्रकाश से सप्तर्षि ताराओं को तपाता है,
वहां कल्याण होने में शङ्का है । अत एव वहां पांच वारुण पशुओं को
जो काली गौ या बकरा या भेड़, हरि, वायव्य, बहुरूप, दिश्य, मारुती,
मेषी, आग्नेय और प्राजापत्य ॥ “क्षीरौदनोऽपां नप्त्र उद्रः” ॥२॥ “उतेयं
भूमिः” इत्यादि तीन ऋ० से वरुण देव की स्तुति करके ॥३॥ “अप्सु
ते राजन्०” इत्यादि ४ ऋ० से आहुती देवे ॥४॥ “वायवा रुन्धि०”