सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

२१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।


त्रोपसमाहार्यं भवति तदुपसमाहृत्य ॥ २५॥ अतो यज्ञो-
पवीती पित्र्युपवीती बर्हिर्गृहीत्वा विवृत्य संनहनं
दक्षिणापरमष्टमदेशमभ्यवास्येत् ॥ २६ ॥ बर्हिरुदकेन
सम्प्रोक्ष्य बर्हिषदः पितर उपहूता नः पितरोऽग्निष्वात्ताः
पितरो ये नः पितुः पितरो येऽस्माकमिति प्रस्तृणाति
॥२७॥ आयापनादीनि त्रीणि ॥२८॥ उदीरतामिति तिसृ-
भिरुदपात्राण्यन्वृचं निनयेत् ॥ २९ ॥ अतः पित्र्युपवीती
यज्ञोपवीती ये दस्यव इत्युभयत आदीप्तमुल्मुकं त्रिः
प्रसव्यं परिहृत्य निरस्यति ॥३०॥ पर्युक्ष्य ॥३१॥८॥८७॥
ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया
चरन्ति। त्वं तानग्ने अप सेध दूरान्सत्या नः पितॄणां स-
न्ह्वाशिषः स्वाहा स्वधेति हुत्वा कुम्भीपाकमभिघारयति
॥१॥ अग्नये कव्यवाहनायेति जुहोति ॥२॥ यथानिरुक्तं
द्वितीयाम् ॥३॥ यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्य इति


जो यहाँ लाना आवश्यक हो उन सब को लावे ॥२४॥२५॥ इसलिये
यज्ञोपवीती, और उपवीती (प्राचीनावीती) हो बर्हिकुश को लेकर
बर्हिकुशों को बिछाकर उस पर आयचन करे अर्थात् बर्हिको जल से
संप्रोक्षण कर “बर्हिषदः पितरः०” इत्यादि से बर्हिकुश का आस्तरण करे॥२७॥
“आयात पितर.” यह ऋ०, “आच्या जानु०” यह ऋचा और “संविशन्तु०”
यह ऋचा। इन तीन ऋचाओं से तिलों को बिखेर कर ॥२८॥उदीरतां०”
इत्यादि तीन ऋचाओं से जलपात्रों में से एक २ को ऋचा पढ़ २ कर लावे
॥२९॥ इसलिये “पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती ये दस्यवः०” से दोनों ओर
जलते उल्मुक को तीन बार बायें होकर-घुमाकर डाल देवे और जल से
पर्युक्षण कर देवे ॥३१॥८॥८७॥ यह सत्तासीवी कण्डिका खतम हुई ॥
“ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना०” इत्यादि से स्वाहा, स्वधा लगाकर
आहुति देकर कुम्भीपाक का अभिघार देवे ॥ १ ॥ “अग्नये कव्यवाह-
नाय०” से आहुति करे ॥ २ ॥ “सोमाय पितृमते०” से दूसरी आहुति
देवे ॥ २ ॥ “यमाय पितृमते स्वधा पितृभ्यः”। से तीसरी आहुति