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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 361 में से

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पृष्ठ 22

( ८ )

अपची गोंठा को नष्ट करता है । बाद् ( मूर्वाकन्द ) सर्पविष नाशक है ।
विक्षर ( समुद्र फेन ) कफमय खांसी को नष्ट करता है । विश्वरूपा
( काला अगर ) पशुओं के रोगों को दूर करता है । विष ( स्थावरविष )
सर्प के काटे विषका नाशक है । विषाणा ( मृगशृङ्ग ) क्षेत्रिय रोगों को
या जन्म के हृदय रोग को नष्ट करता है । विषाणा ( मेढा सींगी ) रक्त-
स्राव और वात रोग को दूर करती है । विषपुलिङ्ग का ( गुद् पुच्छ को
निरन्तर ऊपर नीचे को उचकने वाली चिड़िया ) सर्प के काटे विष को
नीचे के गुदा अङ्ग से चूसने वाली है। वृषा ( कपिकच्छ, कौंच ) दुबलेपन
को दूर करती, नष्ट वीर्य में पुनः वीर्य स्थापन करती एवं पुरुषत्व शक्ति
देती है । और स्वास्थ्य प्रद् है और वशीकरण एवं रसायन है । शकुन्तिका
( भासपक्षी ) सर्प काटे विषको चूसन कर लेती है । शङ्खमणि ( शङ्खमुक्ता
मासिकरोगों को नष्ट करती है। तथा विषनाशक है। शतवार मणि ( ऋष-
भक ओषधि ) पुत्रोत्पत्ति शक्ति को देती, नपुंसकता, गर्भघातक कृमियों
को नष्ट करती है; ज्वर नाशक है एवं ज्वर एवं सन्दिग्ध रोगों को हटाती
एवं रसायन है । शुक ( तोता पक्षी ) हलीमक, कामला, पाण्डु रोगों
को नष्ट करता है । रोगी के उसके पास रहने से उक्त “रोगों को आकर्षित
करता है। शूद्रा ( प्रियंगु लता ) ज्वर को नष्ट करती है। शोचि ( कुशा )
सर्प के काटे विष का बन्धन करती है । श्वेत ( अलर्क सफेद ) वमन
विरेचन प्रलेप आदि द्वारा सर्प विषका अत्यन्त नाशक है । समिध
( सुगन्ध काष्ठ या शुद्ध काष्ठ ) पेटके अन्दर कीड़ों को नष्ट करती है ।
सहदेवी ( महाबला ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । समुद्रफल—
ईर्ष्या, मानसिक, दाह को नष्ट करता है । सुपर्ण ( गरुड़ पक्षी ) चूसने से
या अपने मलमूत्र आदि से सर्प काटे विष को निर्बल करता है । सुभा
( शालपर्णी ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । सोम ( सोमलता सोम-
वल्ली, महौषधि ) सर्प के काटे विषको दूर करने की महौषधि है । मूर्छा-
दि मानसिक रोगों, अयोग्य हीनदृष्टि, दूषित वाणी को ठीक करती हैं ।
खान पान में से कृमि दोषों को दूर करती है । स्त्री के प्रति प्रसङ्ग से
हुए उरःक्षत, राजयक्ष्मा को दूर करती है । क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है
हवि ( घृत, घृतादि सुगन्ध होम ) राजयक्ष्मा, वातव्याधि, सन्दिग्ध
रोग, क्षेत्रिय रोग, इत्यादि रोगों को नाश करती है । स्वास्थ्य और
आयु को बढ़ाती है । हारिद्रव ( दारुहल्दी के वृक्ष) इनमें रहने, इनके
दर्शन, वायु सेवन, और स्वरस कषाय के पान और अन्य योगों के सेवन