कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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है। सुख से प्रसव कराता है, और सब ही जानवरों के विष को नष्ट
करता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है, कृमि नाशक है। रुके मूत्र को
बाहर निकालता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और सर्व रोगना-
शक रसायनरूप है। सूर्य के पर्यायवाची नाम—सूर्य, अर्यमा, सविता
और आदित्य हैं।
आठ वसु जिनका वर्णन वेदों में है, उन आठ वसुओं के भिन्न २
गुणों के कहने के पश्चात् अब अकारादि क्रम से अथर्ववेदोक्त दवाओं
के गुणों का वर्णन करते हैं। अग्नि—(चित्रक या चीता दवा) यह दवा
योनि दोष, गर्भ संस्राव, जातघातक रोगों तथा योनि एवं गर्भाशय में
होने वाले कृमियों का नाशक है। अङ्ग (बोल नाम की दवा) बुखार
को दूर करता है। अजशृङ्गी (मेढ़ासिंगी) शरीर में विष तुल्य मादक
प्रभाव लानेवाले कृमियों को नष्ट कर देती है, भूत के द्वारा उन्माद का
नाशक है। अदिति (गौ के दूध, घी, दही, माठा आदि पञ्चगव्य) सांप
के विष को दूर करता है। अपामार्ग (श्वेत अपामार्ग, ढाल अपामार्ग,
चिड़चिड़ी) सफेद चिड़चिड़ी मन्दाग्नि, ग्लानि, वमन, बन्ध्यापन,
सन्तान स्तम्भन को दूर करता है, और लाल चिड़चिड़ी तृष्णा रोग,
भस्मक रोग, पुरुषेन्द्रिय की निर्बलता को हटाता है। और अधः स्थान
(गुदा, लिङ्ग, योनि) के अर्श रोग (बवासीर) और ऊर्ध्व स्थान (मुख,
नाक) के अर्बुदों को नष्ट करता है। वीर्य्य स्तम्भक बाजीकरण है।
संक्रमित होने वाले छूत रोगों को नष्ट करता है। अर्क (आक, अकवन)
जननेन्द्रिय (लिङ्ग) में हर्ष एवं वृद्धि करने वाली बाजीकरण है।
अर्जुनकाण्ड (कुह वृक्ष)*क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और खेत के
अनुपज को नष्ट करता है। अश्वत्थ “शमीस्थ” (पीपलबन्दा, शमी वृक्ष
पर लगा हुआ) गर्भ स्थापन कारक है, और पुरुष द्वारा सेवन करने
से पुत्र पैदा होता है एवं स्त्री द्वारा सेवन करने से कन्या होती है।
और पुरुष के वीर्य्य एवं स्त्री के रज का बढ़ाने वाला है। अश्ववार
(कांस) सर्प काटे विष का बन्धन रोकने वाला है। असिक्नी (नीलिनी,
नीळ) केशों की सफेदी, श्वेत कुष्ठ, गलित कुष्ठ को दूर करती है।
आञ्जन (अञ्जन सुरमा) हलीमक, पाण्डु, विषय भोग से हुए रोग,
अङ्गभेदक, विसल्यक फैलनेवाले विसर्प, हृदय और श्वास रोग को दूर
करनेवाला आयुवर्द्धक है। आञ्जनमणि—सर्पकाटे विष एवं स्थावर
विष को नष्ट करता है। मोहरूप मानसिकरोग का नाशक है। स्वप्न-