सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०५
ये अग्नय इति क्रव्यादादुपहत इति पालाशं बध्नाति ॥१६॥
जुहोति ॥१७॥ आदधाति ॥१८॥ उदञ्चनेनोदपात्र्यां
यवानङ्गिारानीयोल्लोपम् ॥१९॥ ये अग्नय इति पाला-
श्या दर्व्या मन्थमुपमथ्य काम्पीलीभ्यामुपमन्थनीभ्याम्
॥२०॥ शमनञ्च ॥२१॥७॥४३॥
य आत्मदा इति वशाशमनम् ॥ १ ॥ पुरस्तादग्नेः
प्रतीचीं धारयन्ति ॥२॥ पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्यान्वा-
रब्धायै शान्त्युदकं करोति ॥ ३ ॥ तत्रैतत्सूक्तमनुयोजय-
ति ॥ ४ ॥ तेनैनामाचामयति च सम्प्रोक्षति च ॥ ५ ॥
अन्न ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ १४ ॥ और बूढ़ी स्त्रियां गीत
मङ्गल्यादि करें, ब्राह्मण गण पुण्याह वाचन करे ॥ जहां घर, मण्डप
या कुटी आदि हो चाहे पत्थर, ईंट, मट्टी, टट्टी, काष्ठ अदि के क्यों न
हों सब ही दशा में इसी विधि से वास्तु याग करना चाहिये ॥१५॥ “ये
अग्नय०” “क्रव्यादादुपहत०” इत्यादि ७ ऋचासे पालाश मणि को बान्धे ।
और आज्य की आहुति देवे ॥१७॥ और यहीं आधान करे ॥१८॥ उत्तर
से जलपात्र में यवों को डाल कर लाकर आलो पात्री से यव की आहु-
ति देवे ॥ १९ ॥ “ये अग्नय०” से पलाशी दर्वी से मन्थको
काम्पीली की दो मन्थनियों से मथकर ॥ वशा (जो गौ गर्भ
धारण नहीं करती) शमन विधान को कहते हैं ॥ “ये अग्नय०”
इन १० ऋचाओं से वशा को अभिमंत्रण करके तब ब्राह्मण को
देवे ॥ जिस घर में वशा रहती है वह गृह दैवहत होता है ॥२१॥७॥४३॥
यह तेतालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥
“य आत्मदा०” से वशाशमन कर्म करे जिससे तज्जन्य दोष दूर
होवे ॥ १ ॥ अग्नि के पूर्व भाग में वशा को पश्चिम मुँह कर खड़ी
रक्खे ॥ और अग्नि के पश्चिमभाग में पूर्वमुख बैठकर अन्वा-
रब्धा वशाके लिये शान्ति उदक को करे ॥ ३ ॥ उस शान्ति उदक
में “य आत्मदा०” सूक्त का अनुयोग करे ॥४॥ उस शान्ति उदक
से ( मातली–अन्त. से ) आचमन करावे एवं प्रोक्षण करे ॥ ५ ॥
१४