कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
DevanagariSanskritpublished119 पृष्ठ
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तस्मादनवानं१ संक्रामेत् ॥१॥ अमृतं वै प्राणः ॥२॥ अमृतेन तन्मृत्युं तरति ॥३॥ समस्ते-
नोत्तरेणार्धर्चेन प्रणौति ॥४॥ वज्रमेव तत् पाप्मने भ्रातृव्याय प्रहरति ॥५॥ ता दश गायत्र्यः
संपद्यन्ते ॥६॥ अष्टाक्षरं हि दशमं पदम् ॥७॥ गायत्री वै सा यानुष्टुप् ॥८॥ गायत्रमग्रेऽछन्दः
॥९॥ दश प्रातःसवनेऽध्वर्युर्ग्रहान् गृह्णाति ॥१०॥ नवसु बहिष्पवमानेन स्तुवते ॥११॥
हिंकारो दशमः ॥१२॥ दशमाः ॥१३॥ ते नाना कुर्वन्तो विराजमभिसंपादयन्ति ॥१४॥
एतद् वै कृत्स्नमन्नाद्यं यद् विराळ्वेव२ ॥१५॥ तत्३ संपाद्य यजमाने प्रतिदधाति ॥१६॥ त्रिः
प्रथमया त्रिरुत्तमयैकादश संपद्यन्ते ॥१७॥ याज्या द्वादशी ॥१८॥ द्वादश वै मासाः संवत्सरः
॥१९॥ संवत्सरस्यैवा