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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary

महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा

DevanagariSanskritpublished119 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

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[पृष्ठम् ६२]

[XIII, 3, १०-5, २०               कौषीतकिब्राह्मणे               62]

षाग्निं प्रीतवाथातिमुमुचिरे ॥१०॥ तथो एवैवंविद्वान् होता हविरग्ने वीहीत्येव हविषाग्निं
प्रीतवाथातिमुच्यते ॥११॥ तानि वा एतानि षळक्षराणि हविरग्ने वीहीति ॥१२॥ षळङ्गो
ऽयमात्मा षड्विधः ॥१३॥ तदात्मनैवात्मानं निष्क्रीयाणृणो भूत्वाथ यजते ॥१४॥ स एषो
ऽवत्सारस्य प्राश्रवणस्य³ मन्त्रः ॥१५॥ स न मन्येत केन वा नु केन वा यजामीति⁴ ॥१६॥
ऋषिकृतेन मन्त्रेणैव यजामीत्येवं⁵ विद्वान्⁶ ॥१७॥ अथ सोम इति वै पशुमवोचाम ॥१८॥
एवं पुरोळाशान् ॥१९ ॥३॥

¹ L. प्रास्रवणो; (var.) प्राश्रवणो    ² L. P. एवं