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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 868, कुल 1079 में से

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पृष्ठ 868

षष्ठम लम्बक ८१९
वहाँ निवास के लिए एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। मेरे बैठने पर वह ब्राह्मण अपनी
पत्नी से बोला-॥१९८॥
'आज पर्व का दिन है इसलिए ब्राह्मण के लिए खिचड़ी पकाओ। तब उसकी पत्नी ने
कहा 'तुम दरिद्र के यहाँ यह कहाँ ? यह सुनने पर उस ब्राह्मण ने पत्नी से फिर कहा- 'प्रिये
संग्रह करने पर भी अत्यन्त संग्रह करने की बुद्धि नहीं करनी चाहिए। इस विषय में कथा
सुनो' ॥१९-१ ॥
कहीं जंगल में एक बहेलिया शिकार करके मांस लिये हुए धनुष-बाण चढ़ाकर एक
सूअर की ओर झपट पड़ा ॥१ १॥
और, बाण से आहत सूअर के डाढ़ के आघात से वह स्वयं भी मर गया। दूर
से एक सियार यह सब देख रहा था ॥१ २॥
वह वहाँ आया और भूखा होने पर भी भोजन का संग्रह करने की दृष्टि से उसने सूअर,
बहेलिया आदि के प्रचुर परिमाणवाले मांसों को उसने नहीं चखा। उसने पहले धनुष में लगी चमड़े
की डोरी को ही खाना प्रारम्भ किया। उसी समय धनुष के हिलने से उससे छूटे हुए बाण से
वह स्वयं बिंधकर मर गया। इसलिए, अति संग्रह न करना चाहिए। ब्राह्मण ने इस प्रकार
कहने पर, उसकी पत्नी ने तिलों को सूखने के लिए धूप में रख दिया। तब उसके घर के भीतर
चले जाने पर कुत्ते ने उसमें मुँह डालकर उन तिलों को भ्रष्ट कर दिया। तब उन तिलों को
मूल्य देकर भी किसी ने नहीं खरीदा ॥१ ३-१ ६॥
'इसलिए, लोभ से मोह नहीं किया जा सकता। वह तो केवल कष्ट देने के लिए ही होता है।
ऐसा कहकर आये हुए साधु ने उस साधु से कहा- 'तुम्हारे पास कुदाल हो तो मुझे दो।
मैं आज ही तुम्हारे चूहे के इस उपद्रव को दूर करता हूँ'। यह सुनकर मठ-निवासी साधु ने
उसे कुदाल लाकर दी और छिपा हुआ मैं अपने बिल में घुस गया ॥१ ७ -१ ९॥
तब उस कुदाल को लेकर उस दुष्ट आगन्तुक साधु ने मेरे आने-जाने के बिल को खोदना
प्रारम्भ किया। मेरे भाग जाने पर उस दुष्ट ने क्रमशः जहाँतक खोद डाला जहाँतक वह हार
और अन्य धन-संग्रह उसे मिला। 'देखो मित्र इसी धन के तेज से इस चूहे को इतना बल था कि
उछलकर वह तुम्हारा भोजन खाता था। ऐसा उसने मठवासी साधु से कहा और मैं सुन
रहा था ॥११०-११२॥