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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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प्रथम तन्त्र ७६१
उस सिंह ने एकबार पानी पीने के लिए यमुना के किनारे की ओर आते हुए उस बड़ी डील-
वाले बैल की गर्जना सुनी ॥२ ॥
चारों दिशाओं में फैलनेवाले और इस प्रकार कभी इस न सुनाई पड़नेवाले शब्द को
सुनकर वह सिंह सोचने लगा कि 'यह किसका शब्द है ! मालूम होता है कि यहाँ कोई बलवान्
प्राणी रहता है । वह मुझे देखते ही मार डालेगा या इस वन से निकाल देगा' ॥२१ २२॥
ऐसा सोचकर सिंह बिना पानी पिये ही वन को लौट और अपने अनुचरों में अपने को
छिपाकर बैठ गया ॥२३॥
उसकी यह दशा देखकर उमरा बुद्धिमान् शृगाल रूपी दमनक दूसरे मन्त्री करटक
से एकान्त में बोला-॥२४॥
'हमारा स्वामी सिंह पानी पीने के लिए गया था किन्तु वह बिना पानी पिय ही क्यों
लौट आया इसका कारण पूछना चाहिए ॥२५॥
तब करटक ने कहा- 'यह हमारा व्यापार (काम) नहीं है क्या तू ने खूँटा उखाड़नेवाले
बन्दर की कहानी नहीं सुनी ? ॥२६॥
कील उखाड़नेवाले बन्दर की कथा
कहीं किसी नगर में एक बनिया