सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 814

[Header]
दशम लम्बक ७२७
[/Header]

यह देखकर और क्रोध को रोककर वह धैर्यपूर्वक सोचने लगा कि इस मित्रद्रोही पशु को
मारने से क्या लाभ ? और, इस दुष्टा स्त्री को मारकर भी क्या होगा ? मैं भी इन्हें मारकर पाप
का भागी क्यों बनूँ ॥५६॥
इस प्रकार सोचकर और उन दोनों को छोड़कर वह बोला—'मैं तुम दोनों में से उसे मार
डालूँगा जिसे बार-बार देखूँगा। अब यहाँ मेरी आँखों के आगे कभी न जाना'। इस प्रकार, कहकर
उसके द्वारा छोड़े गये वे दोनों कहीं दूर चले गये ॥५७-८॥
तदनन्तर, दूसरी स्त्री से विवाह करके वह शूरवर्मा निश्चिन्त हो गया
हे महाराज समुचित बुद्धिवाला व्यक्ति विपत्तियों से कभी बाधित नहीं होता। पदुओं
की भी बुद्धि ही कल्याणकारिणी होती है पराक्रम नहीं ॥५ ९ १ ॥

संजीवक बैल और पिंगलक सिंह की कथा १

सिंह बैल आदि की कथा इस सम्बन्ध में सुनो। किसी नगर में एक धनी
वैश्यपुत्र था ॥१२१॥
एक बार व्यापार के लिए मथुरा को जाते हुए उसके रथ का भार ढोनेवाला संजीवक नाम
का एक बैल पहाड़ के टपकते जल से कीचड़वाले मार्ग में जाने हुए, गाड़ी का जुआ टूट जाने से
दलदल म गिरकर फँस गया और उसके अंग शत-विक्षत हो गये ॥१२२ १३॥
उसे गिरकर बेहोश हुए देखकर और उसके उठाने के सभी प्रयत्नों को विफल जानकर
निराश वैश्य ने बहुत समय के पश्चात् उसे वहीं छोड़ दिया और आगे की यात्रा की ॥१२४॥
दैवयोग से वह अनाथ और असहाय संजीवक बैल धीरे-धीरे कुछ स्वस्थ होकर नई कोमल
घासों को खाता हुआ दलदल से निकलकर पहले के समान स्वस्थ हो गया और यमुना के तट पर
जाकर, वहाँ भी हरी-हरी घासों को खाता हुआ स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा और महा
बलवान् होगया ॥१२५ २६॥
उठी हुई और मोटी डीलवाला शिव के वाहन नन्दी के समान मस्त संजीवक सींगों
से मिट्टी के डूहों को उखाड़ता हुआ बार-बार रँभाया करता था ॥१२७॥
उस स्थान के समीप ही अपने पराक्रम से सारे जंगल पर छाया हुआ पिंगलक नाम का एक
सिंह रहता था। दो शृगाल उस मृगराज के मन्त्री थे जिनमे एक का नाम करटक और दूसरे का
नाम दमनक था ॥१२८ १ ॥


१ पंचतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र की कथा जिसका प्रारम्भ इस श्लोक से
होता है—
वर्धमानो महान् स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने।
पिशुनेनातिक्रुद्धेन जम्बुकेन विनाशितः॥
यही कथा बगदाद के शाह हारूँ रशीद के समय कलीला दिमना के नाम से अरबी में
अनूदित हुई है।—अनु