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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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दशम लम्बक ७२१
सुशीला और देवदास की कथा
प्राचीन समय में किसी गाँव में देवदास नाम का कुटुम्बवाला एक व्यक्ति था। सुशीला
यथार्थ नामवाली उसकी स्त्री थी ॥६८॥
'वह स्त्री दूसरे पुरुष के साथ फँसी थी' यह बात उसके सभी पड़ोसी जानते थे।
एक बार देवदास किसी कार्यवश राजकुल में गया। उसी समय उसका वध चाहनेवाली स्त्री ने
अपने जार को लाकर अपने घर की छत पर उसे छिपा दिया ॥६९-७०॥
तब वहाँ से आये हुए और भोजन करके सोये हुए अपने पति देवदास को आधी रात में
उसने अपने जार से मरवा डाला ॥७१॥
और अपने जार को घर से निकालकर शान्त बैठी रही। प्रातःकाल होते ही घर से बाहर
निकलकर चिल्लाने लगी कि मेरे पति को चोरों ने रात में मार डाला ॥७२॥
तब उसके सम्बन्धी बन्धु-बान्धव वहाँ आकर सारी स्थिति देखकर बोले— यदि तेरे पति
को चोरों ने मारा तो वे यहाँ से तुम्हारी कुछ भी सम्पत्ति क्यों नहीं चुरा ले गये ? ॥७३॥
इस प्रकार कहकर उन्होंने वहाँ खड़े उसके बालक से पूछा कि तुम्हारे पिता को किसने
मारा? तब वह स्पष्ट बोला—॥७४॥
'घर की छत पर कोई जवान पुरुष पड़कर तिन से छिपा था। उसी ने रात में उतरकर
मेरे देखते-देखते पिता को मार डाला ॥७५॥
मेरी माँ मुझे पिता के पास से पहले ही उठाकर ले गई। बालक के इस प्रकार कहने
पर उनलोगों ने जान लिया कि इसी दुष्टा के जार ने यह हत्या की है ॥७६॥
तब उसके बन्धु-बान्धवों ने जार को ढूँढ़कर उसी समय मरवा डाला और उस बालक
को अपने संरक्षण में लेकर सुशीला को गाँव से बाहर निकाल दिया ॥७७॥
इस प्रकार दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली नारियाँ अपने पति का घात करती हैं।
हरिदास के इस प्रकार कहने पर धीमन्त ने फिर कहा— ॥७८॥
दुष्टों की बात छोड़िए धर्म के प्रभाव से ही मनुष्य धन्यवाद को प्राप्त करता
है। इसकी यह कहानी सुनिए—॥७९॥
वज्रसार और उसकी स्त्री की कथा
उस सुन्दर और शूरवीर वज्रसार की स्त्री अत्यन्त रूपवती थी और वह कुलवती भी
थी। वह वज्रसार को अपने शरीर से भी अधिक प्यार करती थी। ॥