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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

अष्टम लम्बक १८१
तदनन्तर, वे प्रभास आदि तीनों वीर, क्रोध से अन्धे और चार साथियों के साथ आये हुए
श्रुतशर्मा से भिड़ गये ॥१८॥
उन वीरों द्वारा छोड़े गये बाण आकाश में इस प्रकार छा गये मानों सूर्य के ताप से
रण-लक्ष्मी की रक्षा करने के लिए आकाश में चँदोवा तान दिया गया हो ॥१९॥
तदनन्तर, वे विद्याधर भी आकर जुट गये जो पहले रथहीन होने के कारण समर
छोड़कर भाग गये थे ॥२०॥
तब सूर्यप्रभ ने श्रुतशर्मा आदि अनेक महारथी योद्धाओं को एक साथ सम्मिलित होकर
युद्ध करते देखकर प्रभास आदि की सहायता के लिए अन्यान्य प्रज्ञाढ्य आदि महारथी मित्रों को
तथा वीरसेन शतानीक आदि राजपूतों को सहायतार्थ भेजा ॥१११-११२॥
आकाश-मार्ग से उनके जाने पर सूर्यप्रभ ने उनके रथों को भूतासन विमान द्वारा भेज
दिया ॥११३॥
उन सभी धनुर्धारी महारथियों के अपने-अपने रथों में बैठ जाने पर, श्रुतशर्मा के साथी
अन्य विद्याधर भी आकर एकत्र हो गये ॥११४॥
तब उन विद्याधरों के साथ प्रभास आदि का विनाशकारी युद्ध प्रारंभ
हुआ ॥११५॥
उस द्वन्द्व-युद्ध में दोनों सेनाओं के वे प्रसिद्ध महारथी मनुष्य विद्याधर और असुर काम
आये ॥११६॥
राजा वीरसेन ने सेना के साथ शुभ्रलोचन विद्याधर को मार डाला और वीरसेन भी
रथहीन होकर हरिशर्मा से मारा गया ॥११७॥
अभिमन्यु ने विद्याधर-वीर हिरण्याक्ष का वध कर डाला और अभिमन्यु को सुनेत्र ने
मार दिया। प्रभास ने सुनेत्र और हरिशर्मा के शिर काटकर गिरा दिये। ज्वालामाली और
ड्वापु दोनों आपस में ही कट मरे ॥११८-११९॥
कुम्भीरक और तीरदंष्ट्र दाँतों से प्रहार करते हुए और उस पराक्रमी सुशर्मा भुजाओं के
कट जाने से मारे गये ॥१२०॥
व्याघ्रभट, शंभुभट और सिंहभट ये तीनों विद्याधरों के राजा प्रवहण द्वारा मारे गये
और उस प्रवहण को सुरोह और विरोह ने मार डाला तथा श्मशानवासी सिंहबल से सुरोह और
विरोह भी मारे गये॥१२१-१२२॥