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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक १७
हे दिव्य प्रकाशधारी निर्मल बल-स्वरूप हे निर्दोष व्यक्तियों से देखे जानेवाले अत्यन्त
आश्चर्यमय शिव ! तुम्हें प्रणाम है। हे आधे शरीरमें गिरिजा को धारण करनेवाले विशुद्ध
ब्रह्मचारिन् ! हे सङ्कल्पमात्र से विश्व की रचना करनेवाले और स्वयं विश्वस्वरूप ! तुम्हें
प्रणाम है ॥११ १०२॥
इस प्रकार, स्तुति करते हुए और तीन दिनों तक उपवास किये हुए राजा से प्रसन्न होकर
शिव ने दर्शन देकर कहा—'राजन् ! उठो। तुम्हारे वंश का प्रवर्तक बालक उत्पन्न होगा और
गौरी की कृपा से तुम्हें एक उत्तम कन्या भी होगी ॥१०३-१०४॥
वह कन्या तुम विद्याधरों के होनेवाले चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की महारानी
बनेगी' ॥११ ५॥
ऐसा कहकर शिव के अन्तर्धान होने पर वह विद्याधरों का राजा प्रातःकाल प्रसन्न
चित्त होकर उठा और उसने अपनी महारानी अलङ्कारप्रभा को स्वप्न का समाचार सुनाकर
आनन्दित किया रानी ने भी स्वप्न में पार्वती के द्वारा इसी प्रकार के वरदान प्राप्त करने
का समाचार सुनाया ॥११ ६-११७॥
राजा ने उठकर स्नान करके शिव की पूजा की और दान दिया तथा व्रत का पारणोत्सव
किया। कुछ दिन व्यतीत होने पर रानी अलङ्कारप्रभा ने गर्भ-धारण किया ॥११८-११९॥
वह रानी मधु से सुगन्धित और चंचल नेत्र भ्रमरवाले पाण्डुरवर्ण कमल के समान मुख
से राजा को आनन्दित करने लगी ॥१२० ॥
तदनन्तर प्रसिद्ध और प्रशंसनीय जन्मवाले पुत्र को रानी ने इस प्रकार उत्पन्न किया
जैसे आकाश सूर्य को उत्पन्न करता है ॥१२१॥
उत्पन्न होते ही उस कुमार ने अपने फैलते हुए तेज से उस प्रसूति-गृह को मानों सिन्दूर
से लाल कर दिया ॥१२२॥
पिता हेमप्रभ ने शत्रुकुल का भय देनेवाले उस पुत्र का नाम आकाशवाणी के आज्ञानुसार
वज्रप्रभ रखा ॥१२३॥
तब वह बालक पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अपने तेज-रूपी गरुड़ को बढ़ाने के लिए
क्रमशः बढ़ने लगा ॥१२४॥
तदनन्तर राजा हेमप्रभ की रानी अलङ्कारप्रभा ने पुनः थोड़े दिनों में ही गर्भ धारण
किया ॥१२५ ॥
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