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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक २१७
उसी समय से यह समाचार जानकर हमारा स्वामी यह राजकुमार तुम्हारे स्नेह
से खिचकर अपने जीवन की बाजी लगाकर और सैकड़ों देशों को पार कर समुद्र के किनारे
पहुँचा ॥२ ॥
वहाँ पर हेमपुर के राजा चित्रकार राज्यधर ने यन्त्र से चलनेवाला विमान
दिया ॥२ १॥
मूर्त्तिमान् साहस के समान उस भयंकर विमान पर चढ़कर समुद्र के दुर्गम भाग को पार
कर हम दोनों यहाँ पहुँचे हैं ॥२ २॥
इसीलिए, यह मेरा मालिक तुम्हारे लिए 'हा हंसिनी ! हा हंसिनी !'—इस प्रकार
बकता-बकता व्याकुल हो गया है और तुम्हारे पास तक यहाँ आया है ॥२ ३॥
अब यह तुम्हारे आनन्द-दायक मुख चन्द्र के दर्शन से असंख्य दुःख-रूपी अन्धकार से
इसका छुटकारा हो रहा है। इसलिए अत्यन्त कष्ट और उत्कण्ठा से आये हुए इस अतिथि को
दृष्टिरूपी नील कुमुदों की माला से सत्कृत करो' ॥२ ४२ ५॥
राजकुमारी कर्पूरिका ने भी गोमुख की बनावटी बातों को अपने पूर्वजन्म के वृत्तान्त-क्रम
से मिलाकर सत्य समझा ॥२ ६॥
और सोचने लगी कि ओह ! मेरे पति का मुझ पर इतना स्नेह है। इस पर मेरा क्रोध
व्यर्थ ही था। मुझे इससे विरक्तता भी भ्रम के कारण हुई—ऐसा सोचकर वह स्नेह से पिघल
गई और बोली—॥२ ७॥
'वह हंसिनी मैं ही हूँ। और धन्य हूँ कि मेरे लिए आर्यपुत्र को जो यम तक कष्ट
उठाना पड़ा । सो अब मैं प्रेम से खरीदी गई आप लोगों की दासी हूँ। ऐसा कहकर उसने
नरवाहनदत्त को स्नान भोजन आदि से सम्मानित किया ॥२ ८२ ९॥
तब अपने दास-दासियों के द्वारा यह बात उसने अपने पिता को कहला दिया
और स्वयं भी पिता के पास गई ॥२९ ॥
विवाह की इच्छा प्रकट करती हुई कन्या और उसके योग्य वर नरवाहनदत्त को आया
हुआ जानकर तथा उसे विद्याधर चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त जानकर राजा ने अपने को
धन्य-धन्य माना ॥२११ २१२॥
और, उसने कन्या कर्पूरिका को बड़े आदर के साथ विधिपूर्वक नरवाहनदत्त
को दे दिया ॥२१३॥
राजा कर्पूरक ने जामाता को प्रत्येक अग्नि-प्रदक्षिणा के अवसर पर तीन-तीन करोड़
सोना और उतना ही कपूर प्रदान किया ॥२१४॥
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