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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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पृष्ठ 238

सप्तम लम्बक २०९
राजभवन के समीप ही एक बूढ़ी औरत के मनोरम मकान को देखकर, उस विनम्र वृद्ध
से अनुमति प्राप्त कर वह निवास के लिए उस घर में घुसा ॥१४ ॥
अब राजकुमारी से मिलने की युक्ति सोचते हुए उसने उस स्त्री से कुछ ही देर में
पूछा कि हे आर्ये ! यहाँ के राजा का क्या नाम है और उसकी सन्तान क्या है ? और, उसका रूप
कैसा है ? यह हमें बताओ। क्योंकि हम विदेशी हैं। राजा नरवाहनदत्त के इस प्रकार पूछने
पर वह बूढ़ी उसकी उत्तम आकृति देखकर बोली— ॥१४१-१४२॥
'हे भाग्यशालिन् ! सुनो मैं सब तुमसे कहती हूँ। इस कर्पूरसम्भव द्वीप में कर्पूरक नाम
का राजा है। सन्तान-हीन उस राजा ने सन्तान के लिए, अपनी महारानी बुद्धिकार्या के साथ
शंकर की उपासना की। तीन रातों तक उपवास किये राजा को शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया
कि उठो तुम्हें पुत्र से भी अधिक प्यारी कन्या उत्पन्न होगी जिसका पति विद्याधरों का राजा
होकर साम्राज्य प्राप्त करेगा। शिवजी से इस प्रकार आदेश दिया गया राजा प्रातःकाल
उठा ॥१४३-१४६॥
उसने प्रसन्नचित्त होकर रानी बुद्धिकार्या को अपना सपना वह सुनाया और उसके साथ ही
व्रत का पारण किया ॥१४७॥
कुछ दिनों बाद उसकी रानी ने गर्भ धारण किया और सम्पूर्ण अच्छे लक्षणोंवाली
सर्वोत्तमुन्दरी कन्या उत्पन्न की ॥१४८॥
उस कन्या की शरीर-ज्योति से प्रसूति-गृह के सारे दीपक निष्प्रभ-से हो गये। मानो
उजालने के बहाने माना वे अपनी पराजय के कारण सम्मुख होने से डर रहे थे ॥१४९ ॥
तब राजा कर्पूरक ने उत्सव करके और उसका नामकरण-संस्कार करके उसका नाम
कर्पूरिका रखा ॥१५०॥
जनता के नेत्रों तथा मन को नया आनन्द देनेवाली वह कर्पूरिका कन्या बढ़ती हुई अब पूर्ण
युवावस्था में है ॥१५१॥
उसका पिता उसका विवाह करना चाहता है किन्तु वह पुरुषों से द्वेष रखनेवाली
कमलिनी विवाह करना नहीं चाहती ॥१५२॥
उसकी स्नेही देवी माता के यह पूछने पर कि 'अंगि ! ब्याह के काम का क्या
विचार है ? तू पुरुष क्यों नहीं चाहती?' —यह पूछने पर वह इस प्रकार बोली—॥१५३॥
'मातः ! मैं अपने पूर्व जन्म का हाल जानती हूँ। सो देवी आप सुनिये कि विवाह न करने
का कारण बताती हूँ। संसार के जितने सब बड़ा आश्चर्य का खेल है ॥१५४॥
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