कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ११३
कलह-रहित होकर इस घर में हम दोनों अत्यन्त सुखी थे और देवता पितर तथा अतिथि
को देकर बचे हुए परिमित अन्न को हम साथ खाया करते थे॥ २॥
हम दोनों की आवश्यकता से अधिक भोजन-आच्छादन आदि जो भी होता था उस
हम किसी दीन-दुःखी को दे देते थे॥१३॥
कुछ समय के अनन्तर उस देश में एक बार अकाल पड़ गया। इस कारण हम दोनों को
मिलनेवाला भोजन अब कम मात्रा में मिलने लगा॥१४॥
तब भूख-प्यास से व्याकुल और अन्न की कमी से कष्ट पाते हुए हम लोगों के भोजन के
समय कोई थका हुआ ब्राह्मण अतिथि घर में आ गया॥१५॥
फलतः इस भीषण प्राण-संकट के समय में भी हम दोनों ने अपना सारा भोजन उसे
दे दिया॥ १६॥
उस अतिथि के तृप्त चले जाने पर प्राणों ने मेरे पति को इसलिए छोड़ दिया मानो
'उसका अतिथि के प्रति विशेष आदर था, मेरे प्रति नहीं'—अर्थात् मेरा पति क्षुधा से पीड़ित
होकर परलोक सिधार गया॥१७॥
तब मैं पति की चिता सुधारकर सती होने के लिए उस पर चढ़ गई और मेरी विपत्ति
का भार उतर गया॥ ८॥
तदनन्तर मैं इस जन्म में राजा के घर महारानी होकर तुम्हारी पत्नी बनी। पुण्य का
वृक्ष तुरन्त ही अचिन्तनीय फल प्रदान करता है॥ १९॥
रानी के इस प्रकार कहने पर राजा ने कहा—'आओ प्रिये! मैं वही तुम्हारे पूर्वजन्म
का पति देवदास हूँ। मैंने भी आज ही अपना पूर्वजन्म स्मरण किया है॥१०-११॥
ऐसा कहकर और अपने पूर्वजन्म के संस्मरण उसे बताकर प्राणहीन राजा उस देवी के
साथ ही स्वर्ग को चला गया॥१२॥
इस प्रकार मेरे माता-पिता द्वारा दूसरे लोक में चले जाने पर मेरी माता की बहन मौसी
मेरा पालन-पोषण करने के लिए मुझे अपने घर ले गई॥१३॥
जब मैं कुमारी अवस्था में ही थी तब वहाँ एक मुनि अतिथि के रूप में आया और मेरी
मौसी ने मुझे उसकी सेवा के लिए आदेश दिया॥१४॥
मुनि द्वारा दुर्वासा के समान मेरे द्वारा यत्न से सेवा करने पर प्रसन्न मुनि के वर प्रदान
से मैंने तुम्हारे इस धार्मिक पति को प्राप्त किया॥१५॥