कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ६५
राजा ने इस प्रकार पीड़ित और दुर्बल वैश्यपुत्र को देखकर कहा—'तू इतना दुर्बल क्यों
हो गया ? मैंने तेरा भोजन तो बन्द नहीं किया था'॥३५॥
वैश्यपुत्र कहने लगा—'प्रभो ! आप द्वारा दी गई प्राणदण्ड की आज्ञा के समय से ही मैं
भय के कारण अपनी आत्मा को भी भूल गया भोजन की तो बात ही क्या ? प्रतिक्षण सिर पर
मंडराती हुई मृत्यु को ही देखता हूँ'॥३६-३७॥
ऐसा कहते हुए वैश्यपुत्र से राजा ने कहा—'बेटा मैंने प्राणदण्ड का भय देकर तुझे युक्ति
पूर्वक ज्ञान कराया॥३८॥
इसी प्रकार समस्त प्राणियों को मृत्यु का भय होता है। उनकी रक्षा के लिए उपकार
से बढ़कर और धर्म क्या है ? ॥३९॥
मैंने तुझे धर्म और मुक्ति का यही तत्त्व समझाने के लिए यह उपाय किया था क्योंकि
मृत्यु से डरा हुआ बुद्धिमान् व्यक्ति मुक्ति के लिए यत्न करता है॥४०॥
इसलिए इसी प्रकार का धर्म करनेवाले अपने पिता की तुम निन्दा न करना। राजा
की यह बात सुनकर नम्र वैश्यपुत्र ने कहा—॥४१॥
आपने धर्म का उपदेश देकर मुझे कृतार्थ किया। अब मेरी इच्छा मुक्ति के लिए हो
रही है। अतः हे स्वामिन् उसका भी उपदेश दें'॥४२॥
यह सुनकर राजा ने उत्सव (मेले) के दिनों में वैश्यपुत्र के हाथ में तैल से भरा एक बरतन
देकर कहा—॥४३॥
'इस पात्र को लेकर तुम मेले के दिनों में सारी नगरी का भ्रमण करके आओ। लेकिन
बेटा इस बात का ध्यान रखना कि तेल की एक बूँद भी न गिरने पावे॥४४॥
यदि इसमें से एक बूँद भी तेल गिरा तो मेरे ये सिपाही तुम्हें मार डालेंगे ॥४५॥
ऐसा कहकर राजा ने उसे नगरी का चक्कर लगाने के लिए छोड़ दिया और उसके पीछे
नंगी तलवार लिये हुए सिपाही नियुक्त कर दिये॥४६॥
वह वैश्यपुत्र भयपूर्वक अत्यन्त सावधानी से तेल की रक्षा करता हुआ बड़े ही कष्ट से
सारी नगरी की प्रदक्षिणा करके लौट आया॥४७॥
राजा ने भी बिना एक बूँद तेल गिराये तैलपात्र लेकर आए हुए वैश्यपुत्र से कहा—
'बेटा तुमने नगर में भ्रमण करते हुए किसी संगीत या वाद्य को सुना ? ॥४८॥
यह सुनकर वैश्यपुत्र ने हाथ जोड़कर कर कहा—'महाराज ! यह सच है कि भय से
कांपते हुए मैंने न किसी को देखा और न कुछ सुना॥४९॥