सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 430

तृतीय लम्बक १८९
तदनन्तर सेनापति षण्मुखकुमार ने शीघ्र ही तारकासुर को मारा। देवतागण प्रसन्न
हुए और पार्वती ने अपने को पुत्रवती माना॥९९॥
तो बिना गणेश-पूजन के देवताओं को भी सिद्धि सम्भव नहीं। इसलिए, तू भी उचित
पति की प्राप्ति के लिए उनका पूजन कर॥१००॥
सखियों से इस प्रकार कही गई मैंने बगीचे के एकान्त स्थान में स्थित विघ्नराज की
पूजा की थी। पूजा के अन्त में मैंने अकस्मात् देखा कि मेरी सखियां अपनी सिद्धि के प्रभाव से
उछलकर आकाश में पक्षियों के समान उड़ रही हैं॥१०१-१०२॥
यह देखकर आश्चर्य से मैंने उन्हें बुलाकर और नीचे उतारकर पूछा कि यह क्या है?
तब उन्होंने तुरन्त कहा—मनुष्य का मांस खाने से प्राप्त होनेवाली ये डाकिनी-मन्त्रों की सिद्धियां
हैं। कालरात्रि नाम की ब्राह्मणी इस विषय में हमारा गुरु है। आकाश में चलने की सिद्धि के
लिए साध्य होने पर मानव-मांस खाने से भयभीत मैं कुछ समय तक सोचती रही। किन्तु उस
सिद्धि का लोभ न रोक सकी और सखियों से बोली कि मुझपर यह दीक्षा मुझे
दिलवाओ॥१०३-१०६॥
तब मेरी प्रार्थना पर वे मेरी सहेलियां उसी समय विकट आकृतिवाली कालरात्रि को
बुला लाईं। उस कालरात्रि का विकट रूप था—जैसे भिंची हुई भौंहें, भींची आँखें, धँसी हुई
चिपटी नाक, फूले लटके हुए स्तन, फूला हुआ पेट, फटे और फूले पाँव, मानों विधाता ने कुरूपता
के निर्माण में अपनी विशेषज्ञता का प्रदर्शन किया हो ॥१०७-१०९॥
पैरों पर झुकी हुई और स्नान करके गणेश का पूजन किये हुए मुझे नंगी करके वह
कालरात्रि मंडल के बीच बैठकर भैरव की पूजा करने लगी॥११०॥
तदनन्तर मेरा अभिषेक करके उसने उन मन्त्रों की दीक्षा दी और देवताओं द्वारा भोग
लगाया हुआ मनुष्य का मांस मुझे खाने के लिए दिया॥१११॥
मन्त्रों की दीक्षा लेकर और मनुष्य के मांस का भक्षण करके मैं तभी ही सखियों के साथ
आकाश में उड़ने लगी॥११२॥
इस प्रकार आकाश में सैर-कूद करके गुरु की आज्ञा से भूमि पर उतरकर मैं अपने निवास-
स्थान पर गई॥११३॥