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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 942 में से

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पृष्ठ 405

उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४७

आमं विदग्धं सश्लेष्म रसशेषं तथैव च। चतुर्विधमजीर्णं तु तस्य वक्ष्यामि लक्षणम्।।

उपर्युक्त अजीर्ण के ४ भेद—१. आमाजीर्ण २. विदग्धाजीर्ण ३. श्लेष्माजीर्ण तथा ४ रसशेषाजीर्ण। यह चार प्रकार का अजीर्ण होता है। उनके लक्षण मैं कहूंगा। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अजीर्ण के इन्हीं भेदों का उल्लेख किया है—आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानलैस्त्रिभिः। अजीर्णे केचिदिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः॥ श्लेष्माजीर्ण को ही यहां विष्टब्धाजीर्ण कहा गया है।

यथाभुक्तं भवेद्दामे, धूमोद्गारौ विदाहिनि। सश्लेष्मणि गुरुत्वं तु, रसशेषे तु हृद्द्रवः ।।

इनके सामान्य लक्षण—आमाजीर्ण में रोगी को ऐसा प्रतीत होता है मानों अभी २ भोजन किया गया है। विदग्धाजीर्ण में मुंह से धुंआ निकलता है तथा डकार आती है। श्लेष्माजीर्ण में शरीर में भारीपन होता है तथा रसशेषाजीर्ण में हृदय में भारीपन (Palpitation of Heart) प्रतीत होता है, सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—माधुर्यमन्नं गतमामसंज्ञं विदग्धसंज्ञं गतमम्लभावम्। किंचिद्विपक्वं भृशतोदशूलं विष्टब्धमाब(न)द्धविरुद्धवातम्॥ उद्गार शुद्धावपि भक्तकांक्षा न जायते हृद्गुरुता च यस्य। रसावशेषेण तु सप्रसेक चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम्॥ अर्थात् आमाजीर्ण में सेवन किया हुआ भोजन (आम रस के कारण) मधुरता को प्राप्त होता है। विदग्धाजीर्ण में अम्लता को प्राप्त होता है। विष्टब्धाजीर्ण में भोजन का आधा परिपाक होकर पेट में पीड़ा तथा शूल होती है तथा नीचे का मार्ग बन्द हो जाने से वायु ऊपर की ओर चढ़ती है। तथा रसशेषाजीर्ण में शुद्ध डकार आने पर भी भोजन की इच्छा नहीं होती, हृदय प्रदेश पर भारीपन रहता है तथा मुंह से लालास्राव होता रहता है। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. ११ में भी कहा है—तत्रा मे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटयोः। उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते॥ विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः। मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम्॥ विदग्धे भ्रमतृण्मूर्छाः पित्ताच्च विविधाः रुजाः। उद्गारश्च सधूमाम्लःस्वेदो दाहश्च जायते॥ रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे॥

तन्द्रीशूलारतिग्लानितृड्विदाहारुचिभ्रमाः । अङ्गमर्दज्वरानाहाः सर्वेष्वप्यल्पशो गदाः ।।
सर्वैरसध्यतोत्कृष्टैः क्रमशो याप्यसाध्यते । साध्यानां साधनं यत्तु तन्मे प्रवदतः शृणु ।।
आमस्योद्धरणं पथ्यं, विदग्धे प्रावृतः स्वपेत् ।
सश्लेष्मणि भवेत् स्वेदः, परिशोष्यो रसाधिके ।।

सब अजीर्णों के सामान्य लक्षण—सब प्रकार के अजीर्णों में थोड़ी मात्रा में तन्द्रा, शूल, अरति, ग्लानि, प्यास, विदाह, अरुचि, भ्रम, अङ्गमर्द, ज्वर तथा आनाह आदि लक्षण होते हैं। जब ये सब उपर्युक्त लक्षण प्रबल रूप में उपस्थित हों तो रोग असाध्य हो जाता है। इसके विपरीत अल्प लक्षण होने पर रोग क्रमशः याप्य अथवा साध्य होते हैं। इनमें से जो साध्य रोग हैं उनकी तूं मेरे से चिकित्सा सुन।

यदुक्तं पथ्यमशनं तदेवैतेषु शस्यते । दीर्घकालोषधानां तु मुद्गमण्डः सदाडिमः ।।

इनकी सामान्य चिकित्सा—आमाजीर्ण में आम का उद्धरण करना चाहिये अर्थात् लङ्घन के द्वारा आम का पाचन कर देना चाहिये। विदग्धाजीर्ण में कपड़ा ओढ़कर सो जाये (अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—तत्राभुक्तवा दिवा स्वप्यात्-अर्थात् बिना कुछ खाये दिन में सो जाये)। श्लेष्माजीर्ण में स्वेदन देना चाहिये (कफ के विलय के लिये) तथा रस की अधिकता (अर्थात् रसशेषाजीर्ण) में शोषण करना चाहिये (लङ्घन इत्यादि के द्वारा)। सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनका निम्न चिकित्सा सूत्र दिया है—तत्रामे लंघनं कार्यं विदग्धे वमनं हितम्। विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं रसशेषे शयीत च॥ यहां चिकित्सा में थोड़ा अन्तर है। सुश्रुत में विदग्धाजीर्ण में वमन तथा रसशेषाजीर्ण में सोने का विधान है जब कि यहां पर विदग्धाजीर्ण में सोने

२६ का.सं.