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सर्वकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 264 में से

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पूछा कि हे साहिब ! हे कृपानिधान ! गुरुमुख की क्या पहचान होती है? साहिब ने कहा—

जब लग तन में हंस रहाई । निरखे शब्द अंतै नहीं जाई ॥

यानी जब तक शरीर में प्राण हैं, गुरु के शब्द को नहीं काटे । गुरु आज्ञा निरखत रहे, जैसे मणिहिं भुजंग। गुरु के शब्द की तरफ ही ध्यान रखे । भुजंग साँप को कहते हैं। मणि की तरफ ही ध्यान रखता है । ओस चाटने जाता है तो मणि को बाहर करके रखता है, पर ध्यान मणि में ही होता है । कभी नहीं हटाता है I

कहैं कबीर धर्मदास से, यह गुरुमुख को अंग ॥

यही गुरुमुखता है। इससे हृदय प्रकाशित हो जायेगा और दुर्मति का नाश हो जायेगा। गुरु नानक देव भी वाणी में कह रहे हैं-

शब्दहि सेवे सो गुरुमुख होई ॥

पहली बात यह कि आपको मैंने क्या शब्द बोले ? जो भी शब्द बोले, उसमें मेरा क्या स्वार्थ है ? किसके कल्याण के लिए हैं ? आपके ही कल्याण के लिए हैं । यदि कोई दिन में 50 झूठ बोल रहा है और कह रहा है कि मैं भक्त हूँ तो यह भक्ति की मजाक है । आपकी नज़र में भी उसका कोई मूल्य नहीं रहेगा। दूसरा, जो दारू पी रहा है, नशे में घूम रहा है, उसका भी आपकी नज़र में कोई मूल्य नहीं होगा । जो अपनी स्त्री को छोड़कर पराई स्त्री की तरफ जा रहा है, चरित्रहीन है, उसके लिए आपका नज़रिया अच्छा नहीं हो सकता है। जो जुआ खेल रहा है, वो भी आपकी नज़रों में बेकार ही होगा। जो ठगी, बेइमानी कर रहा है, उसका भी आपकी नज़रों में कोई मूल्य नहीं होगा। जो जीवों को मार रहा है, उस आदमी के लिए आपके हृदय में क्या स्थान हो सकता है ! ये सब दुर्गुण हैं। इनसे हटाने के लिए कहा कि ये सब नहीं करना । इनमें कुछ भी ठीक नहीं है। ये क्यों बोले ? नहीं तो आप कौड़ी के भी नहीं रह जायेंगे। इनसे आपका मूल्य बहुत बढ़ गया है। I कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती हैं कि लगता है कि जो गुरु कह रहे हैं। वो ठीक नहीं है और जो मेरा दिमाग़ कह रहा है, वो ठीक है । नहीं, ऐसा नहीं करना। जहाँ मन का प्रयोग करोगे, मन संसार में ही पटकेगा। इसलिए गुरु के आगे समर्पित होना। अपनी अक्ल नहीं चलाना ।