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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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कर्मयोग

सकता है। आज तुम मानव-इतिहास के पत्र उलट कर देखो, क्या वे दुःख-सुख जो पहले थे, अब नहीं हैं। अब भी वे ही दिन-रात और मौसम हैं, जो पहले थे। यूनानी, मिसरी और रूमियों के समय में भी यही दशा थी और अब भी वही है। जहाँ तक इतिहास पता देता है, उसमें बदलाव नहीं हुआ। पर तो भी हम देखते हैं कि मनुष्य ने अपनी उन्नति के लिए सर्वदा कुछ न कुछ यत्न किया है। इतिहास के प्रत्येक समय में ऐसे हज़ारों स्त्री-पुरुष हुए हैं, जिन्होंने दूसरों की भलाई में अपने जीवन को लगाया है। उनको कहाँ तक सफलता हुई, इसमें संशय है। गेंद इधर से उधर तक लुढ़कती रहेगी। शारीरिक दुःख मिटा, मानसिक दुःख उत्पन्न हो गया, ऐसा होता ही रहता है। इधर कमी हुई, उधर बढ़ती हो गई। यह कहना कि किसी समय मैं संसार मैं दुःख न रहेगा, उन्मत्त-प्रलाप है। सब जातियों में यह विश्वास है कि एक दिन ऐसा आवेगा जब कि संसार में पाप और दुःख का नाम न रहेगा, परन्तु यह भ्रमात्मक और अमूलक विश्वास है। यदि ऐसा होगा तो फिर संसार संसार ही न रहेगा।

हम संसार में न तो दुःख की मात्रा बढ़ा सकते हैं, न सुख की। सदा इनकी मात्रा एक सी रहेगी। अन्तर केवल इतना होता है कि गेंद इधर से लुढ़क कर उधर जा रहेगी। यह न्यूनाधिक्य, यह ज्वार-भाटा प्रकृति का धर्म है। कैसे कोई मान ले कि मृत्यु के बिना जीवन हो सकता है? यह असमञ्जस है। जहाँ जीवन है वहाँ मौत का होना भी आवश्यक है। कोई सुख-दुःख के बिना नहीं है। दीपक जल रहा है, थोड़ी देर मैं अवश्य बुझेगा। यदि तुमको जीने