कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 354 में से
संदर्भ में पढ़ें28 KĀNHADADE PRABANDHA
Khanda Verse D Ms Śālāpātra text
" 17 अपकिरत्ती अपकीरती
" 19 पहिलं पहेलं
" 21 पातसाइ पातशाह
" 23 सांभली सांभळी
" 28 पमाउ पसात
" 35 बदीतु बदीउ
" 36 तासु भासु
" 40 परठीइ परठेइ
" 41 टमकि पेसडु दमकिये सडु
" 59 दहोत्तर ददोत्तर
Several of these mistakes are, evidently, the result of
misreading the manuscript.
The late NAVALRĀM PANDYĀ prefixed a note¹ in the first number
of the Śālāpatra (January, 1877) in which the publication of the
Kānhadade Prabandha commences. He said therein that he was
publishing the poem, Kānhadade Prabandha, from the manuscript sent
to him by Dr. BÜHLER, to give the readers an idea of the Old Gujarātī
language. As he had only one manuscript he had refrained from any
emendation of the text. He had intended to give a glossary of difficult
words and discuss the grammar of Old Gujarātī at the end. However,
he did not live long enough to fulfil this promise.
This text, being a verbatim transcript of the D MS, was entirely
useless for purposes of collation.
¹ Vide: "घणाना धारवामा एम छे के गूहराती भाषा हाल जेम बोलाय छे तेम ज नरसिंह महेताना वखतथी
बोलती आवे छे पण ए केवडी ज भूल छे षट्शत वर्ष सुधी भाषा विकार न पामे ए जनस्वभाव अने सगळ्या देशनी
भाषाओना इतिहासथी उलटु छे
आ बाबत आ पत्रमा एक वार जूना प्रयोगोना प्रमाण आपी अमे केटलो फेरफार थयो छे, ते कांइक बताव्युं हतुं
हाल आपणा विद्वान इन्सपेक्टर मेहेरबान डाक्टर बुह्लर साहेबनी तरफथी 'कान्हडदे प्रबंध' ए नामनुं एक जूनूं काव्य अमने
मळ्युं छे ए वखते वर्षनी पहेला ठरावेलुं छे एनो विषय गुजरात उपर अल्लाउदीने सवारी करी ते छे अने एमां वीर तथा
अद्भुत रसनु प्राधान्य छे एनो नायक झालोरनो कान्हडदेव राजा छे एमां युद्धना तथा कूचनां वर्णनो स्वाभाविक,
हुबेहूब छे. अहिया एने महीने महीने प्रगट करवाने विचार कर्यो छे तेनु मुख्य कारण तो ए छे के गुजरातना विद्वानोना
हाथमा जूनी भाषानु एक समग्र पुस्तक आवे जूनी गुजरातीनुं व्याकरण आपवानो अमारो विचार छे, पण ते पहेलां आवो
एकाद ग्रंथ बहार पडे ए अमने वधारे सारु लागे छे.
प्रत छे ते प्रमाणे ज अहिया छापीए छइए एमां एके अक्खरनो पण फेरफार करता नथी. कोइ ठेकाणे भूल जेवुं
लखनारनी तरफनु अमने भासे छे, तोपण ज्यां सुधी केटलीएक प्रत अमारा हाथमां आवी नथी त्यां सुधी तेने छेडवुं ए
अमने न्यायी लगतु नथी जूनी भाषा हालथी केटली जूदी हती ते आ उपरथी सहेज मालुम पडशे उल्टी देहेसत तो ए
छे के केटलाएकथी ए समजाशे ज नहि तेमने अमारी भलामण छे के धीरजथी आ काव्य वांचवु. अने पाछळ अमे शाळा-
पत्रनां जूनी भाषा बावत कांइ लख्युं छे ते उपर लक्ष राखवु एमां आवेला कठिन शब्दोनो कोष तथा व्याकरणनियम
पाछळथी आपवानो अमारो विचार छे."
—'Śālāpatra', January, 1877