कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished354 पृष्ठ
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द्वितीय खंड ८९
॥ दूहा ॥
फिरि करकर विष्थइ, फेरि रहिय फिरि वानि ।
परसनम पंडित टमट, सांतिसि दीसइ सानि ॥ १२५
॥ वस्तु ॥
पाहु चूयौ सुरताण ऊपटइ, छिण घालीयइ घाइ ।
दिहद बात विनासी सांतसि राइह रीसइ पाउ ॥ १२६
इही विनासी पातइ हुंतउ, जुवें तीटं अहियाय ।
छिन संचित कहीइ केतल्लइ, नही मानइ सुरताण ॥ १२७
आसापुरी नमे पाइ लागी, आण्यउ बहुमान ।
सरुप जाणीय सांतसि, तुहि न मूँकइ माण ॥ १२८
१२५ In E vs 125 precedes vs 123, and the order of the lines is in E 125 b
125 a. दूहा—..., E, दु D E J, त्रोटक L. फिरि—फेरी A, फिर B C K, फेरि E, फिरि H, फिरि
L.