कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्ताविक वक्तव्य ३
किया - है'। कविका यह कथन सर्वथा सत्यलक्ष्यी है । हमारे प्राचीन साहित्यमें ऐसी
रचनायें बहुत विरल हैं । ये रचनायें हमारे महान् राष्ट्रकी - हमारी संसारश्रेष्ठ संस्कृतिकी, सबसे
अधिक, अमूल्य निधिरूप हैं । इनके अध्ययन और मननसे हमारे देशकी जनताकी - हमारे
राष्ट्रकी भावि संततिकी संस्कारसमृद्धिका विकास होगा ।
पंडित-कवि पद्मनाभका यह काव्य-प्रबन्ध एक प्रकारसे, प्रायः शुद्ध ऐतिहासिक काव्य
है । इसमें वर्णित घटनायें, बहुत अंशमें, इतिहाससमर्थित हैं । कवि उसी स्थानका निवासी
है जहां पर प्रबन्ध नायक कान्हड दे ने जन्म लिया, राज्य किया और वह अनुपम आत्मोत्सर्ग किया ।
अर्थात् कविका कविता-सर्जन उसी जालोर नगरमें हुआ जो कान्हड दे की राजधानी था । कविको
इस काव्यकी रचनामें प्रेरणा करने वाला उसी चहुआन वीरका सीधा राजवंशज है, जो कान्हड
दे से केवल ५ वीं पीढ़ीमें उसके राज्यसिंहासनका, शायद अन्तिम, उत्तराधिकारी था । इसका नाम
अखयराज सोनगरा था । कविके कथनानुसार यह बड़ा धर्मात्मा, सदाचारी, दानशील, और
ईश्वरभक्त था । इसके सद्गुणोंका संक्षेपमें वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि -
अखइराज उत्तम अवतार, जेहनां पुण्य न लामइ पार ।
जीणइ कीरति कान्हड दे तणी, अखइराजि अजुआली घणी ॥ (४-३३९)
'अखयराज उत्तम अवतारी पुरुष है जिसके पुण्य कृत्योंका कोई पार नहीं है और जिसने
[अपने पूर्वज] कान्हड दे की कीर्तिको खूब उजाला है।' मालूम देता है कविके कुलका संबन्ध
उस राजघरानेके साथ, वंशानुवंश क्रमसे, चला आ रहा था और इस लिये उसने अपने आश्रय-
दाता राजवंशके, एक महान् वीरकी कीर्तिकथा इतने उत्साह और इतनी श्रद्धाके साथ गाई है ।
कवि कहता है कि इस प्रबन्धकी रचना करनेसे
अखइराज सीपामण सरी, पदमनाभ कीरति बिस्तरी ॥ (४-३४१)
'एक तो अखयराजकी प्रेरणा सफल हुई और दूसरी पद्मनाभ कविकी कीर्ति फैली ।'
कहनेकी आवश्यकता नहीं कि कविकी यह उक्ति कितनी यथार्थ है ।
हमने ऊपर, प्रारंभमें, इस प्रबन्धको जो राजस्थानी महाकाव्य कहा है उसके पीछे दो
अर्थ लक्षित हैं - एक तो यह कि इस काव्यमें राजस्थानी वीरकी पुनीत गाथा गाई गई है और
दूसरा यह कि यह प्राचीन राजस्थानी भाषाकी एक सर्वश्रेष्ठ कृति है । अतः विषय और भाषा
दोनों दृष्टिसे यह काव्य राजस्थानी है । इस राजस्थानी विशेषणसे हमारा अभिप्राय उस
भाषावैज्ञानिक शास्त्रीय संकेतसे है, जिसकी स्थापना, भारतीय भाषाओंका वैज्ञानिक पद्धतिसे
विश्लेषण करने वाले विद्वानोंने की है । यद्यपि हमारे निजी अभिप्रायसे, यह नामाभिधान सर्वथा संगत
अर्थ सूचक नहीं है - तथापि जब तक इसके लिये कोई ऐसा अन्य अधिक सार्थक नामनिर्देश
विद्वन्मान्य नहीं बनता, तब तक इसका व्यवहार करना समुचित है । हमारे विद्वान् मित्र -
गुजरातके सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, एवं चिन्तक श्री उमाशंकर जोशीने, इस प्रबन्ध जैसी प्राचीन रचना-
ओंकी भाषाको 'मारू-गूर्जर' भाषाका नूतन नामाभिधान सूचित किया है, जो एक प्रकारसे