सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

७८ | कंब रामायण

पुष्प और श्रेष्ठ चन्दन-लेप भी दिये ; तब वे बहुत संतुष्ट हुए। फिर कुछ सोचकर कहने लगे--

हे तपस्विन् ! आप अपने स्थान से उठे भी नही, तो भी इस दिव्य धेनु ने मेरी सारी सेना को पवित्र तथा बढ़िया भोजन प्रदान कर दिया ; ऐसी विशेषता से युक्त है यह गाय । शास्त्रो के पारगत वेदज्ञ पंडितो का कहना है कि सभी उत्तम वस्तुएँ राजाओ के ही भोग के योग्य होती हैं।

यह धेनु आप जैसे ब्राह्मणो के लिए रखने-योग्य नही है । अतः, यह सुरभि मुझे दे दीजिए । कौशिक के ये वचन सुनकर वसिष्ठ कुछ क्षण तक कुछ भी कहे बिना मौन रहे । फिर कहा—हे शत्रु-भयंकर शूलधारी राजन् ! मैं वल्कलधारी मुनि हूँ । मुझे यह अधिकार नही है कि मैं इसे और किसी को दूँ। यदि वह स्वयं आपके पास जाय, तो उसे ले जायें।

यह सुनकर 'आप के कथनानुसार ही करूँगा'—कहते हुए कौशिक उठे। उन्होने बड़े उत्साह से उस सुरभि को बाँध लिया और चलने लगे, तो सुरभि बंधन तोड़कर वसिष्ठ के पास आ पहुँची और उनसे पूछा—क्या आपने मुझे विश्वामित्र को दे दिया है ? वेदादि सभी तत्त्वो के पारगत (वसिष्ठ) ने कहा—

मैने विश्वामित्र को दिया नही। वह विजयी नरेश स्वय ही तुम्हे ले जाना चाहता है। यह सुनते ही सुरभि क्रोध से भर गई तथा वसिष्ठ से यह कहती हुई कि आप देखें, वज्रनाट के समान मेरी बजानेवाली इस सारी सेना को मैं किस प्रकार नष्ट कर देती हूँ, और उसने अपने रोगटे खड़े कर लिये।

तत्क्षण उस कपिला धेनु ने हथियारो के साथ बर्बर, किरात, चीन, शोणक आदि विविध जाति के सैनिक उत्पन्न किये। उन सैनिको ने कौशिक की बलवती सेना का सहार कर दिया। यह देखकर विश्वामित्र के पुत्र क्रुद्ध हो उठे।

यह सुरभि की शक्ति नही, श्रुतिशास्त्र मे पडित वसिष्ठ की ही माया है। यह कहते हुए उन कौशिक-कुमारो ने वसिष्ठ का सिर काटने के लिए उन्हे आ घेरा। तब वसिष्ठ ने उनको क्रोधाग्नि की ज्वाला से भरी दृष्टि से देखा, तत्काल वे सब मृत होकर गिर पड़े।

कौशिक ने अपने सौ पुत्रों को मरते हुए देखा, तो वे घृत डालने से भड़की हुई अग्नि के समान उग्र हो उठे। वे रथ पर बैठकर आये और अपने धनुष को खूब झुका-कर वसिष्ठ पर एक के पश्चात् एक करके अतिवेग से तीर बरसाने लगे। वसिष्ठ ने अपने हाथ के ब्रह्मदंड को आज्ञा दी कि वह उन तीरो को रोक ले।

(कौशिक ने) साधारण शस्त्रो से लेकर दिव्य अस्त्रो तक अपने अभ्यस्त सभी आयुधो का प्रयोग किया, पर वसिष्ठ का ब्रह्मदंड सभी को निगलकर उज्ज्वल हो खड़ा रहा। तब कौशिक ने मेरु को धनुष बनानेवाले (शिव) का ध्यान किया शिव साक्षात् हुए तथा एक बलिष्ठ अस्त्र देकर चले गये ।१

कौशिक ने उस रुद्रास्त्र का प्रयोग किया। उसे देख देवता डर गये कि अब


१ कंब रामायण के कुछ सस्करणों में यह पद्य नहीं मिलता।—अनु०

बालकाण्ड ७६

तीनो लोक जल जायेगे, अतः वे उस अस्त्र को आते हुए देखकर स्वयं आगे बढ़े तथा उसे स्वयं ही निगल लिया। उस अस्त्र की ज्वालाएँ उनके शरीर के भीतर से बाहर निकलने लगीं, जिनसे वे और भी तेजस्वी हो निखर उठे। विध्वंसक रुद्रास्त्र की यह दशा हुई।

कौशिक ने यह सब देखा। वे सोचने लगे—वेदो के ज्ञाता महर्षियो के वंश में जो शक्ति तथा तेज रहते हैं, वे अन्य (लोगो) के पास नही होते। समस्त पृथ्वी पर राज्य करने की शक्ति भी उस ब्रह्मतेज के सामने कुछ भी नही। यह सोचकर उन्होंने कठिन तपस्या करने की ठानी और इंद्र की दिशा में (प्राची में) चले गये।

राजाओ के अधिराज (विश्वामित्र) महिमामय (वसिष्ठ) की विजय का ही स्मरण करते हुए चले और घोर तपस्या करने लगे। यह देखकर इन्द्र डरा और अप्सराओ में श्रेष्ठ तिलोत्तमा को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा।

कौशिक उस सुन्दरी के रूप को देखकर काम-पीड़ित हो उठे; काम-समुद्र में डूबकर अपनी सुध-बुध खो बैठे और उसकी संगति मे असंख्य दिन बिताये। जब उनका विवेक जागा, तब काम-भोग को विष के समान मानकर वे अट्टहास कर उठे।

अब कौशिक ने जाना कि यह सब इंद्र की वंचना है, उन्होंने क्रुद्ध हो तिलोत्तमा को शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि मे जन्म ले। लाल नेत्रो और क्रोध-भरे मन को लेकर वे वहाँ से चल खड़े हुए ओर यम-दिशा (दक्षिण) की ओर चले गये।

कौशिक दक्षिण दिशा मे तप कर रहे थे। उसी समय अयोध्या के राजा त्रिशंकु ने अपने गुरु वसिष्ठ से प्रार्थना की कि मै सदेह स्वर्ग जाना चाहता हूँ, आप मेरी इच्छा पूरी करें। उन्होंने उत्तर दिया कि मुझसे यह कार्य नही हो सकता।

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर त्रिशंकु बोला—यदि आपसे यह कार्य नही हो सकता है, तो मैं किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए यज्ञ करूँगा। इस पर वसिष्ठ ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया कि तुम अपने प्राचीन गुरु को छोड़कर दूसरे का आश्रय खोज रहे हो, अतः तुम चंडाल बन जाओ।

(शतानंद ने रामचंद्र को आगे की कहानी सुनाई) हे वत्स! ब्रह्मा के मानस-पुत्र (वसिष्ठ) के शाप से राजाधिराज त्रिशंकु का वह तेज मिट गया, जिससे सूर्य भी लज्जित होता था। सूर्योदय-वेला के विकसित कमल-सदृश उसके मुख की वह कांति नष्ट हो गई। वह चंडाल बन गया, जिसके रूप की सर्वत्र निन्दा होती है।

उसके रत्नहार, मुकुट तथा अन्य आभरण लोहे के बन गये, उसके वस्त्र तथा यज्ञोपवीत चर्ममय हो गये उसका शरीर मलिन हो गया और उसका सौंदर्य मिट गया। जब वह इस रूप को लेकर अयोध्या को लौटा, तब सभी लोग उसका धिक्कार करने लगे। तब दुःखी होकर वह अरण्य में चला गया।

कुछ दिनो के उपरांत वह उसी अरण्य मे तप करनेवाले विश्वामित्र के आश्रम के पास आया। विश्वामित्र के पूछने पर कि तुम कौन हो, क्यो आये हो ? त्रिशंकु ने नमस्कार करके अपनी सारी कहानी सुनाई।

विश्वामित्र त्रिशंकु का वृत्तांत सुनकर हँस पड़े और बोले—वस इतना ही।

८२
कंब रामायण

उस मुनिकुमार ने बंदङ्ग ऋषि के कथनानुसार ही यज्ञ मे मंत्र का जप किया। तुरंत ही विशाल पक्ष-युक्त गरुड, हंस, ऋषभ आदि वाहनो के अधिष्ठाता त्रिदेव, अन्य देव परिवार-समेत, उस यज्ञशाला मे आ उपस्थित हुए और उस मुनि-कुमार के प्राणो की तथा वेदविहित यज्ञ की भी रक्षा की। अब मुनिवर (विश्वामित्र) भी उत्तर दिशा की ओर चल पडे।

उत्तर दिशा मे पहुँचकर विश्वामित्र तपोमग्न हुए। अपने कर-कमल से नासिका को वन्द किया, इडा को पिंगला¹ से दबाया और हृदय में एकाक्षर प्रणव का ध्यान करते रहे। इस प्रकार, अनेक वर्ष (ध्यान-मग्न) रहने पर कुंडलिनी मूल की अग्नि से उनका सहस्रार स्फुटित हुआ और उनके कपाल से तमपुज उठे और सभी लोको को आवृत करने लगे, जिससे सभी डर गये।

उनके कपाल से उत्थित वह धुआँ विश्व-भर में ऐसे फैल गया, जैसे त्रिपुर-दाह करनेवाले (शिव) ने गजासुर का सहार करके उसके चर्म को अपने शरीर मे समेट लिया हो, या प्रलय-मेघ ही घिर आये हों।

सभी लोक अंधकार मे डूब गये। अति प्रखर सूर्य के किरण-जाल भी उस तम मे अदृश्य हो गये। दिक्पालो तथा धरणी को धारण करनेवाले दिग्गजो की आँखें उस गाढ अंधकार मे अधी हो गई।

नभ मे, जहाँ ससार के जीवन-प्रद घन-समूह घिरे रहते हैं, वहाँ अब धुआँ भर गया। इससे धरती के सभी चर-अचर, पदार्थ-समुदाय भयभीत हो उठे। खर-किरण (सूर्य) के कर कही भी आगे न बढ सके और सर्वतः मार्ग को रुद्ध पाकर लौट आये। सभी देवता थर-थर काँपने लगे।

पुण्डरीक पर स्थित ब्रह्मदेव, गरुडवाहन विष्णु, वृषभ पर सचरण करनेवाले शकर, वज्रधारी इन्द्र तथा अन्य देवता पृथक्-पृथक् चलकर उस तपोधन के समीप आ पहुँचे।

अर्धचन्द्र को सिर पर धारण करनेवाले (शिव), हरित तुलसीमाला-धारी (विष्णु) तथा उस विष्णु के नाभि-कमल पर आसीन ब्रह्मा—इन तीनो ने विश्वामित्र से कहा—हे महान् तपोधन। तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कौन ऐसा है, जो वेदों का पारंगत हो।

उनके वचन सुनकर विश्वामित्र अपना सिर नवाकर, दोनो कर-कमल जोडे खडे रहे और यह कहकर कि अभीष्ट पुण्य-फल मुझे अभी प्राप्त हुआ है, आनद से फूल उठे। फिर, सभी देव अपने-अपने स्थान पर जा पहुँचे।

यह प्राचीन युग की घटना है। इन कौशिक के समान तपोमहिमा से युक्त अन्य कोई नही है। इस नियमनिष्ठ नीतिज्ञ की करुणा आप दोनों को मिली है। अब आपके लिए असभव कार्य कुछ भी नही है। अनतगुण-पूर्ण शतानंद ने इन शब्दो मे राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र की कहानी सुनाई।

गौतम के प्रियपुत्र शतानद के मुख से यह वृत्तान्त श्रवण करके वे दोनों वीर


१. इडा को पिगला से दबाना—यह प्राणवायु की एक प्रक्रिया है।

बालकाण्ड
८३

विस्मय तथा आनन्द से भर गये। उन्होंने उन तपस्वी के चरणो की वन्दना की और वे उन्हें आशीष देकर अपने आवास को लौटे।

विश्वामित्र तथा लक्ष्मण जब अपनी-अपनी शय्या पर जाकर लेटे, तब रामचन्द्र किसी तमोमय फल के समान ऐसे रह गये कि वहाँ पर केवल निशा थी, चन्द्र था, एकान्त था, सीता ( की स्मृति ) थी तथा स्वयं राम थे।

( राम सोचने लगे ) कदाचित् कोई बिजली मेघ से अलग होकर नारी के सुन्दर रूप में आ उपस्थित हुई है। बहुत सोचने पर भी मै समझ नही पा रहा हूँ कि यह क्या है, क्या नही है ? उस रूप को मै अपने नेत्रों और मन में अंकित देख रहा हूँ।

उस सुन्दरी ( सीता ) के नयन उस क्षीरसमुद्र के जैसे प्रकाशमान हैं, जहाँ कालवर्ण विष्णु आदिशेष पर लेटे रहते हैं। अब वह सुन्दरी मेरे हृदय-रूपी कमल में आ विराजी है। अतः, कदाचित् वह पंकज-निवासिनी लक्ष्मी ही है।

यद्यपि मुझपर वह रमणी करुणाहीन है. तथापि मेरा मन उसपर मुग्ध हो गया है। उसने भयदायक काम-पीड़ा उत्पन्न करनेवाले अपने विष-सदृश नयनों से मुझे पी-सा लिया है, अतः अब मुझे इस ससार के सभी चर-अचर वस्तु-समूह उसी रमणी के सोने के रंग में अंकित-से दीखते हैं।

यद्यपि मैं अपने इस अभागे वक्ष से उस सुन्दरी के स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तनों का—जहाँ पर आभरण स्पंदित होते रहते हैं—आलिंगन नही कर पाया हूँ, तथापि मैं सोचता हूँ कि क्या मै फिर उसकी उज्ज्वल चन्द्रिका जैसी हँसी को तथा उसके बिंबफल-तुल्य अधर को कभी देख सकूँगा ?

मनोहर मेखला से भूषित रथ-सदृश नितंब एक है, खड्ग-जैसे दो-दो नयन हैं दो पीन स्तन भी हैं तथा मुख पर अंकित मदहास भी एक है। हाय ! अपने पराक्रम में प्रख्यात यम-सदृश ( मुझे मारने के लिए ) क्या इतने आयुधों की आवश्यकता है ?

रसपूर्ण इक्षु को धनुष बनाकर और सुन्दरी को व्याज बनाकर यदि मन्मथ मुझ पर पुष्पबाणों की वर्षा करे तथा मुझे परास्त कर दे, तो अब शौर्य नामक गुण किसके पास बचेगा ?

यह चाँदनी ऐसी फैली है, मानो क्षीर-समुद्र का गंभीर जल ससार को निगलने के लिए उमड़ पड़ा हो। ज्यो-ज्यो मैं उस रमणी का स्मरण करता हूँ, त्यो-त्यो वह चाँदनी मेरे प्राणो को समूल उखाड़ने लगती है। क्या संसार में श्वेत रंग का विष भी होता है ?

क्या मेरा शुद्ध मन भी सन्मार्ग से हटकर अनैतिक मार्ग पर चल सकता है ? ( नही ) अब यदि यह मन इस नारी पर मुग्ध हुआ है, तो इसका कारण यही है कि वह चाशनी ( मिसरी ) जैसी मधुर बोलीवाली तथा सोने के रंगवाली बाला कुमारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

इतने में रात्रि व्यतीत हुई; चन्द्र पश्चिम समुद्र में डूब गया, मानो रात्रिकाल-रूपी राजा के मरने पर उसका उज्ज्वल श्वेतच्छत्र गिर गया हो, या पश्चिम दिशा-रूपी नारी के अति प्रकाशमान भाल पर रहनेवाला वर्तुल आभरण खो गया हो।

८४कंब रामायण

अपने प्रियतम चन्द्र के चले जाने पर उसकी प्रेयसी दिशा-नारियो ने मानो अपने शरीर पर लगे हुए मनोज्ञ श्वेतचन्दन रस को शोक के कारण पोछ दिया हो, त्योंही चन्द्र के अस्तङ्गत होते ही उसको चन्द्रिका भी अदृश्य हो गई।

सघन पुष्पहार को धारण करनेवाले पुरुषोत्तम ( श्रीरामचन्द्र ) जिस समय काम-पीडा से इस प्रकार व्याकुल हो रहे थे, उसी समय रक्तवर्ण उष्ण-किरण ( सूर्य ) व्याकुल-हृदय कमलिनी-रूपी अपनी प्रियतमा का मुख विकसित करता हुआ उदित हुआ, मानो लाल बिन्दियो से अलंकृत अंधकार-रूपी मत्तगज का चर्म धारण करनेवाले, उदय-पर्वत-रूपी रुद्र के भाल का अग्नि-नेत्र ही खुल गया हो।

उस महान् उदयाचल के समस्त शिखरो पर बालसूर्य की अरुण-किरणें फैल गइ, मानो सूर्य के अति वेगवान् तथा शक्तिशाली हरे रग के घोडो के खुरो से उड़ी हुई धूलि ही उदयाचल पर फैल रही हो और अर्घ्य-प्रदान के लिए द्विजो के हाथ मे लिये हुए मधुसंचित पुष्प तथा जल के प्रवाह से वह धूलि सिक्त हो रही हो (अथवा) मानो उष्ण-किरण ( सूर्य ) प्राची ( रूपी ) दिग्गज ( के मस्तक ) पर सिदूर का तिलक लगा रहा हो।

जिस प्रकार शत्रु की विजय करने या धन कमाने के लिए दूर देशो में गये हुए प्राण-समान अपने प्रिय पति को सुन्दर रथो पर चढ़कर वापस लौटते हुए देखकर साध्वी पत्नियो के मन आनन्द से भर जाते हैं और उनकी कांति लौट आती है, उसी प्रकार कमलिनी-कुल के मुख विकसित हुए। उन कमलो के कारण सरोवर भी सौंदर्य ने संपन्न हो गये।

आकाश-रूपी रंगमंच पर असंख्य वेदो-सहित किन्नरो के गाते हुए, सभी लोको द्वारा स्तोत्र-पाठ होते हुए, देवो, मुनियो तथा ब्राह्मणो के हाथ जोडकर नमस्कार करते हुए एव सागर-रूपी गर्जन करनेवाले ‘मर्दल’^१ के बजते हुए, सूर्य की किरणें चारो ओर फैल गईं, मानो उज्ज्वल सूर्य-रूपी ललाट-नेत्र से सुशोभित रुद्र ही नृत्य कर रहा हो ओर उसकी लाल जटाएँ चारो ओर बिखरी हो।

विनाशकारी चक्रायुध को त्यागकर अनुपम वर्त्तुल तथा दृढ धनुष को धारण करने-वाले श्यामल (रामचन्द्र) जो सहस्रफन (आदिशेष) के सहस्र माणिक्य-दीपो से जाज्वल्यमान शेष-शय्या का त्याग कर अब वियोग-रूपी गभीर समुद्र मे लेटे हुए थे। एक चक्र-रथवाला सूर्य जब अपने कोमल करो से उनके चरण धीरे-धीरे सहलाने लगा, तव वे व्याकुल निद्रा का त्याग कर उठे और रात्रि-रूपी समुद्र के तट पर पहुँचे।

वह रजनी भी ऐसी बीती, मानो एक कल्प व्यतीत हुआ हो। निद्रा से उठकर मत्तगज के समान वे नित्य-कर्म से निवृत्त हुए। फिर, श्रुति-सदृश महातपस्वी ( विश्वामित्र ) के चरणो पर नत हुए। तब वे अपने प्रिय भाई लक्ष्मण को साथ लेकर सुगन्धित पुष्पहार तथा रत्न-किरीट से अलंकृत जनक महाराज की बड़ी यज्ञशाला मे जा पहुँचे।

उन जनक महाराज ने क्रमानुसार वेदोक्त यज्ञकर्म को सपन्न किया। चारो ओर मेघ-गर्जन जैसे नगाड़ो के बजते समय, इन्द्र के समान वे चल पडे और चन्द्रमंडल को छूने-


^१ मर्दल, एक प्रकार का ढोल या नगाड़ा।

बालकाण्ड ८५

वाले अपने प्रासाद मे आये । (वहाँ) रत्नखचित उन्नत मंडप मे आसीन हुए तथा उनके पार्श्व मे महातपस्वी (विश्वामित्र) सुन्दर विजयमाला धारण किये हुए धनुर्हस्त (रामचन्द्र) और उनके अनुज (लक्ष्मण) आसीन हुए।

जनक महाराज ने वहाँ पर आसीन उत्तमकुल चक्रवर्त्ती-कुमारो को ऐसे देखा, जैसे वे अपनी आँखों से उन दोनो के मुख-लावण्य को पी रहे हों। फिर, तपस्वी विश्वामित्र के सम्मुख सिर नवाकर प्रश्न किया—हे पूज्यपाद ! ये कौन हैं ? विश्वामित्र ने उत्तर दिया—ये दोनो कुमार महिमामय दशरथ के पुत्र हैं। तुम्हारे यज्ञ के दर्शनार्थ आये हैं। तुम्हारे धाम रहनेवाले शिव-धनुप को भी वे देखेंगे । फिर, वे उन दोनो कुमारो की महिमा का वखान करने लगे । (१-१५७)


अध्याय ११

वंश-महिमा-वर्णन

सूर्य के प्रथम पुत्र मनु को कौन नही जानता ? इन्हीं के वंश मे एक ऐसे नरेश (पृथु चक्रवर्त्ती) उत्पन्न हुआ था, जिसने सभी प्राणियो की भूख से बचाने के लिए अपने तेजस्वी धनुष की सहायता से धेनु-रूप धारण किये हुए पृथ्वी से दुग्ध प्राप्त किया था ।

नवरत्न-खचित मनोहरकिरीटधारी (हे जनक)! इसी वंश के एक दूसरे नरेश (इक्ष्वाकु) ने जगत् की व्याधियो तथा पापो को मिटाते हुए अनेक वर्ष-पर्यन्त ब्रह्मा की उपासना की थी और ब्रह्मा की कृपा से आदिशेष पर शयन करनेवाली उस परम ज्योति को हम जैसे लोगो के भी दर्शन का विषय बनाते हुए, मनोज्ञ श्रीरंगविमान¹-सहित उस परम ज्योति को (पृथ्वी पर) ला दिया था । उन महाराज को जो नही जानते, वे यज्ञ हैं ।

इन्ही कुमारो के वंश मे पहले एक दूसरा राजा उत्पन्न हुआ था । देवेन्द्र ने अपने शत्रु असुरो को पराजित करने मे असमर्थ हो, उस राजा से प्रार्थना की कि वह उन


¹ दक्षिण के श्रीरंगक्षेत्र के संबंध मे यह प्रसिद्ध है कि यहाँ का प्रणवाकार विमान जिसमें विष्णु भगवान् श्रीभूमिनायिका-समेत आदिशेष-शय्या पर लेटे हुए हैं, पहले सत्यलोक में ब्रह्मा के द्वारा पूजित था । वैवस्वत मनु की नासिका से उत्पन्न इक्ष्वाकु महाराज ने ब्रह्मा को अपनी तपस्या से संतुष्ट किया तथा उनसे श्रीरंगविमान को प्राप्त कर उसे भूलोक पर ले आये। इक्ष्वाकु से श्रीरामचन्द्र तक सूर्यवंश के सभी नरेशों ने (कुलदेव के रूप में) इसी श्रीरंगनाथ की पूजा की थी। रामायण की घटनाओं के पश्चात् जब विभीषण अयोध्या से लंका को लौट रहा था, तब रामचन्द्र ने विभीषण को अपने कुलदेव की मूर्ति और श्रीरंगविमान दिया था । विभीषण ने उस विमान को कावेरी की दो शाखाओं के मध्य रखकर विश्राम किया, फिर चलने के समय उसे उठाना चाहा, तो वह विमान उठा नहीं । तब विभीषण ने यह समझकर कि भगवान् की इच्छा वहाँ पर रहने की है, उसने उस विमान को वहाँ प्रतिष्ठापित कर दिया। श्रीरामानुजाचार्य के अनुयायी मानते हैं कि भूतल के १०८ विष्णु-क्षेत्रों मे श्रीरंगक्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है । —अनु०

८६ कंब रामायण

असुरो से स्वर्ग की रक्षा करे । तब इन्द्र को अभयदान देकर वह नरेश हाथ मे धनुष-बाण लेकर गया था तथा असुरो को युद्ध मे हराया था । स्वय इन्द्र वृषभ का आकार लेकर (युद्ध मे) उस नरेश का वाहन बना था । (यह 'ककुत्स्थ' नामक इक्ष्वाकुकुल के राजा की कहानी है ।)

उस (ककुत्स्थ) महाराज के पश्चात् जो महान् व्यक्ति इस वंश में उत्पन्न हुए थे, उनका वर्णन करना मेरे लिए सभव नही है । इसी वश मे एक ऐसा नरेश उत्पन्न हुआ था, जिसने अपने पलित केशो, सकुचित चर्म तथा वार्द्धक्य को दूर कर दिया था। जिसने तरगो से शब्दायमान क्षीरसागर को बड़े पर्वत से मथकर अमृत निकाला था और देवेन्द्र को अमर बनाया था। उसकी कीर्त्ति शब्दो मे वर्णित नही हो सकती है। (इस पद्य में वर्णित राजा कौन है, यह मूल कथानक मे नहीं है।)

युद्ध समाप्त करके भाले को कोश मे ही रखनेवाले (हे जनक) । अब तुमसें युद्ध करने के लिए कोई सन्नद्ध नही है। इन राजकुमारो के ऐसे अनेक पूर्वज हुए हैं, जिनका आज्ञाचक्र त्रिभुवन मे चलता था और जिनमें असख्य श्रेष्ठ गुण थे। उनमें एक (मान्धाता) ने इस प्रकार शासन किया था कि सहज वैरी व्याघ्र तथा हिरण एक ही घाट पर जल पिया करते थे।

अनेक विजयी राजाओ के द्वारा वदित चरणवाले (हे जनक) ! सहनशील देवता और दानव एक बार युद्ध करने लगे थे, तब इन्ही के वंशज एक नरेश ने—जिसनं यथोक्त रीति से अपने राज्य पर अभिषिक्त होकर उसके चिह्नभूत रत्न-किरीट तथा हार धारण किये थे—प्रकाशमान धनुष धारण करके, धर्मदेवता के समान एकाकी सचरण करता हुआ अमरावती की रक्षा की थी। (यह कदाचित् 'मुचुकुंद' नामक राजा हैं।)

हे विद्युत्-सदृश ज्योतियुक्त दीर्घशूलधारी (जनक) ! इस वश के राजाओ की, जो सौन्दर्यवर्धक वीरककण धारण करनेवाले थे और जो सब प्यारे प्राणियो के प्राण-समान रहकर भूलोक पर शासन करत थे, हम क्या प्रशसा कर सकते हैं ? इन्ही में से एक (शिवि) ने एक पक्षी के प्राणी के बदले मे अपने प्राण दे दिये थे।

शत्रु-नरेशो के शरीर भेदनेवाले शूलधारी, हे नृपवर ! इस वश के नरेशो ने (एकबार अश्वमेध अश्व के खो जाने पर) बडे-बडे पर्वतो को रास्ते के रोड़ों के समान उडा दिया था। इस भूलोक को एक ऊँचा टीला बनाते हुए लवण-जल से भरे सागर को खोदा था। इनकी महिमा को जताने के लिए और क्या कहे ? (यह सगर-कुमारो से संबद्ध घटना है।)

हे (शत्रुओं के) मास-सिक्त कातिवाले शूल को धारण करनेवाले। जब अनतशेष ही इस वंश के महत्त्व का बखान नहीं कर सकते हैं तो क्या यह मेरे लिए सुलभ हो सकता है ? पुष्प-भूषित शिवजी के मस्तक पर जो पवित्र गगा आकर ठहरी थी, उसे स्वर्ग से भूतल पर ले आनेवाला नरेश भी इसी वंश में उत्पन्न हुआ था।

कलक-रहित पूर्णचन्द्र-समान उज्ज्वल दंतच्छत्रधारी (हे जनक) ! इस वश के एक नरेश ने जलचरो से भरे सागर से घिरी हुई धरती को हस्तामलक के समान अपने वश

बालकाण्ड ८७

में कर लिया था । उसने वेदोक्त विधान से एक सौ दुष्कर यज्ञ सम्पन्न किये थे, जिससे देवेन्द्र भी सकट में पड़ गया था । (कुछ विद्वानो का कहना है कि इसमे वर्णित नरेश 'नहुष' है ।)

इस वंश मे कोई एक ऐसा नरेश हुआ था, जिसने चन्द्र को जीता था, किसी ने रुद्र को परास्त किया था, किसी ने बाण से धुँढ¹ नामक असुर को मारा था और रघु नामक राजा ने इन्द्र को परास्त करके आगे की दिशाओ पर विजय प्राप्त की थी ।

इस वश के अज नामक राजा ने अपने धनु-रूपी मदरपवत को मथनी बनाकर शत्रुराजकुल-रूपी समुद्र का मंथन किया था और मल्लयुद्ध मे कुशल उम राजा ने ज्योतिमंय मंदहास से शोभायमान इन्दुमती-रूपी लक्ष्मी देवी को. अपने कंधे का उसी प्रकार आभरण बनाया था,

जिस प्रकार अंधकार-ममान वर्णवाले विष्णु ने ( लक्ष्मी को अपना आभरण ) बनाया था । विविध वाद्य-घोष से मुखरित राजद्वारवाले ( हे जनक ) ! ऐसा कोई नहीं है, जो अज महाराज के पुत्र दशरथ को नहीं जानता । उन दशरथ के ही ये दोनो पुत्र हैं। यदि चतुर्मुख ब्रह्मा भी इनकी महिमा का यथावत् वर्णन करने लगें, तो उन्हे भी ( इनकी महिमा का ) पार पाना कठिन है । फिर, भी मुझसे जहाँतक हो सकेगा, मै उसका वर्णन करूँगा ।

जाज्वल्यमान विष्णुचक्र-तुल्य सूर्य जिस प्रकार ओसकणो को परास्त करता है, उसी प्रकार वे दशरथ महाराज शत्रु-राजाओ को पराजित कर समस्त प्राणी-वर्ग के अविपन्न जीवन बिताने मे सहायक हुए हैं। अपने हाथ के धनुष के अतिरिक्त अन्य कोई उनका साथी नहीं है ( ऐसे पराक्रमी हैं वे ) । धर्म ही उनका कवच है । उन्होने अपनी नीति से स्वयं मनु को भी जीत लिया है । वे दशरथ सतानहीन होने के कारण बहुत दुःखी थे ।

फिर, दशरथ ने उस ऋष्यश्रृंग मुनीश्वर की सहायता से अपने दुःख से निस्तार पाना चाहा, जो पहले कभी धनुषाकार भाल, मधुरभाषी बिम्बाधर, काले और दीर्घ नयन, मूल्य पर दिये जानेवाले विशाल जघन, विद्युल्लता-सदृश विकंपित कटि से शोभायमान वेश्याओ को स्तन-रूपी शृ गवाले मृग समझकर उनपर मोहित हुए थे और अपने आश्रम को छोड़ उनके साथ ही ( रोमपाद के यहाँ ) आ गये थे ।

दशरथ ने ऋष्यश्रृंग के चरणो पर नत हो प्रार्थना की - ( हे मुनि ! ) मेरी तपो-हीनता के कारण, कंचुक-बद्ध स्तनवाली मेरी पत्नियो के पवित्र गर्भ से पुष्पालंकार के योग्य मस्तकवाले पुत्र उत्पन्न नही हुए हैं। अतः, आप मुझे ऐसे सत्पुत्र प्रदान करें, जो मेरे बाढ समुद्र से आवेष्टित इस धरणी का शासन कर सकें ।

ये वचन सुनकर ऋष्यश्रृंग ने कहा - मै तुम्हे ऐसे पुत्र प्रदान करूँगा, जो इस धरणी का ही नही, परन्तु सभी लोको की रक्षा अनायास ही कर सकेंगे । ( इसके लिए ) देवताओ के हविर्भाग प्राप्त करने योग्य यज्ञ करना चाहिए, उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ सग्रह करो ।


१. गुरु-पत्नी का हरण करनेवाले चन्द्र को दिलीप ने परास्त किया था। स्कंदपुराण तथा सनत्कुमार-संहिता से विदित होता है कि भगीरथ ने अपने यागाश्व का हरण करनेवाले पशुमुख के साथ युद्ध करते हुए शिवजी को भी पराजित किया था और कुवलयाश्व नामक राजा ने उत्तंग महर्षि के शत्रु 'हुँढ' को मारा था ।—अनु०

८८
कंब रामायण

दशरथ ने त्वरित ही पुत्र-प्राप्ति के निमित्त-भूत यज्ञ के लिए आवश्यक सब पदार्थ संगृहीत करा दिये। महान् तपस्वी (ऋष्यशृंग) ने पुत्रकामेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया। उस यागाग्नि से भूतगण का नायक महाभूत, प्रकाशमान सुन्दर थाल में अमृत-तुल्य श्वेत खीर लेकर निकला।

गुणों में अपना उपमान न रखनेवाले दशरथ ने वेदों के तत्त्वज्ञ ऋष्यशृंग की आज्ञा से स्वर्णपात्र-सहित उस अन्न को क्रमशः रमणीय ललाट-युक्त अपनी तीनों पत्नियों को चार भागों में बाँटकर दिया।

महान् पापों के पाप के कारण तथा अनन्त वेदों में कथित धर्मों के धर्म (पुण्य) के कारण, अरुण अधरवाली कौशल्या ने इस नीलसमुद्र (राम) को जन्म दिया, जिसके विशाल हस्त में 'कटक' (आभरण) भूषित हैं तथा जिसका सुन्दर रूप चित्र में अंकित करने में असम्भव है।

केकय-नरेश की पुत्री (कैकेयी) ने भरत नामक पुत्र को जन्म दिया, जो अनिवार्य नीतिधर्म-रूपी अनुपम नदियों के द्वारा भरा गया गंभीर समुद्र है, अनिन्दनीय सद्गुण-संपन्न है और सौन्दर्य में भी इस (रामचन्द्र) की समता करनेवाला है।

इन दोनों रानियों में कनिष्ठा (सुमित्रा) ने दो पुत्रों (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) को जन्म दिया जो अपूर्व शक्ति-संपन्न हैं तथा धर्मघाती असुरों को भी कँपा देनेवाले हैं। स्वर्णमय मेरु और उन्नत रजतमय हिमाचल, दोनों यदि धनुष धारण करके खड़े हों, तो उन दोनों कुमारों की समानता कर सकेंगे।

चतुर्वेदों के तुल्य वे चारों कुमार सभी विषयों के परिज्ञान में सरस्वती से भी बढ़-कर हैं। धनुर्विद्या में ऐसे हैं कि स्वयं धनुर्वेद भी उनसे परास्त होकर, उनके वशीभूत शत्रु के समान उनकी सेवा में निरत रहता है। वे (चारों बालक) राका-चन्द्र के उदय-काल में आनन्द-घोष के साथ उमड़नेवाले तरंगपूर्ण समुद्र के जैसे बढ़ते रहे हैं।

शत्रुओं का विनाश हो जाने से अब कोश में रखे हुए दीर्घ शूलवाले (हे जनक)! ये दोनों नाममात्र से उस दशरथ के कुमार हैं, जो (दशरथ) कर देनेवाले सभी नरेशों के द्वारा वन्दित तथा वीर-वलयधारी चरणवाले हैं और जो अत्यन्त क्षमाशील हैं। वस्तुतः, इनका उपनयन-संस्कार करके वेदों की शिक्षा देकर इन्हें पालनेवाले वसिष्ठ ही हैं।

मैंने सोचा कि मेरे यज्ञ में अधिक विघ्न उपस्थित करनेवाले अत्याचारी राक्षसों को इन दोनों कुमारों के द्वारा मैं मिटा दूँगा। ज्योंही मैं इन पुष्पकोमल चरणवाले सुकुमार कुमारों को लेकर अरण्य में गया, त्योंही असह्य शक्तिशालिनी ताड़का नामक राक्षसी स्वयं सामने आ गई।

हे राजन्! तरंगायित समुद्र जैसे इस श्यामल पुरुष-श्रेष्ठ की इन दीर्घ तथा पुष्ट नील भुजाओं का बल भी तो तुम देखो। इसका एक बाण, युद्ध-रंग में लाल-लाल अग्निवर्षा करनेवाले नयनोंवाली उस ताड़का का हृदय चीरकर, पर्वत को भेदकर, वृक्षों को काटकर, पृथ्वी को चीरता हुआ चला गया।

गगन के रंगवाले तथा आग की लपटों के जैसे बालों से भरे हुए, जलते हुए-से

बालकाण्ड ८९

लगनेवाले (राक्षसों के) जो सिर कट-कटकर पर्वताकार गिरे, उनकी कोई गणना ही नहीं रही। उस ताड़का का एक पुत्र (सुबाहु) एक ही बाण से परलोक जा पहुँचा। दूसरा पुत्र (मारीच) कहाँ जा गिरा, उसका पता नहीं है। मैं अपना यज्ञ भी सम्पन्न करके अब यहाँ आ पहुँचा हूँ।

हे राजन्! यह जानो कि हम इनकी महिमा जानने में भी असमर्थ हैं। मैं अपनी तपस्या के फलस्वरूप इन्हें ऐसे अस्त्र प्राप्त करके दे सकता हूँ, जो समुद्र तथा पर्वत-सहित सारे संसार को जला सकते हैं। वे सभी अस्त्र इनकी आज्ञा के पालक दास बने हुए हैं।

इनके कमल-सदृश, वीर-वलय-भूषित चरण की रज ही गौतम की पत्नी को (शाप-मुक्त करके) पूर्वरूप प्रदान करनेवाली है। मुझे अपने प्राणों से भी बढ़कर इस श्यामल पर प्रेम है।

ऐसा है इस रामचन्द्र का दिव्य चरित तथा भुजबल—यों विश्वामित्र ने कहा।
(१-२६)


अध्याय १२

धनुर्भंग पटल

तब जनक ने विश्वामित्र के प्रति ये वचन कहे—आपको मैं क्या बताऊँ ? मैंने उस मायावी धनुष को प्रणबन्ध कर रखा है, जिससे मैं अब अपने इच्छानुसार कुछ नहीं कर सकता। मेरा मन (इस श्रीरामचन्द्र को देखकर, उसे सीता के योग्य वर समझकर और शिव-धनुष की बात स्मरण करके) अत्यन्त अधीर हो रहा है। यदि यह कुमार धनुष पर डोरी चढ़ा सके, तो मैं दुःख-सागर को पारकर जाऊँगा तथा मेरी पुत्री भी भाग्यवती होगी।

यों कहकर जनक ने अपने सम्मुख स्थित कुछ सेवकों को आदेश दिया कि पर्वत-सदृश उस धनुष को यहाँ ले आओ। 'यथाज्ञा' कहकर चार सेवक दौड़कर उस आयुधागार में गये, जहाँ स्वर्ण-वलयों से अलंकृत वह धनुष रखा था।

अतिबलशाली गज-जैसे शरीरवाले, पहाड़-जैसे पुष्ट तथा लोमश कंधोंवाले, साठ सहस्र वीर, बड़े-बड़े बल्लों पर रखकर उस धनुष को उठा लाये।

वह धनुष लाया गया, तो विशाल धरती (जहाँ पर एक दीर्घकाल से वह धनुष रखा हुआ था) अपनी पीठ की पीड़ा दूर कर सकी। (उसे देखकर) सुदृढ खड़ा ऊँचा मेरु गिरि भी लज्जित हो गया। समुद्र जैसी जनता शोर-गुल करती हुई उस धनुष को देखने के लिए उमड़ आई। ऐसा लगा कि उस विशाल धनुष को रखने योग्य खाली स्थान कहीं भी नहीं है।

कुछ लोग कहते थे—शंखचक्र-विभूषित हस्तवाला, सिंह-सदृश यह (विष्णु का अवतार रामचन्द्र) यदि इस शिव-धनुष पर डोरी न चढ़ा सके, तो संसार में इसे छू सकने-

६०
कम्ब रामायण

वाला भी कोई व्यक्ति नही मिलेगा। यदि आज ही यह कुमार इसे चढ़ा दे, तो सीताजी का शुभ-विवाह सुसपन्न हो सकेगा।

कुछ लोग कहते थे—इसे धनुप कहना धोखा है, यह सोने का पहाड मेरु है। कुछ कहत थे—ब्रह्मा न इसे अपने हाथो से स्पर्श करके नही बनाया, किन्तु अपने महान् तप के प्रभाव से ही इसे निर्मित किया है ओर कुछ कहतं थे—न जाने पूर्व काल मे इसे कौन चढ़ाता था ?

कुछ कहंत थे--दृढ मेरु को ही इस धनुप का आकार दिया गया है, या पूर्वकाल मे जिम मंदरपर्वत से क्षीरसागर को मथा गया था, वही पर्वत इस धनुप के रूप में यहाँ पडा हे, या प्रभावशाली, प्रकाशमान सर्पराज (आदिशेप) ही है यह, या गगनस्थ दीर्घ इन्द्र-धनुष ही अब किमी प्रकार यहाँ आ गिरा है।

कुछ कहत थे—महाराज ने इसे ले आने की आज्ञा ही क्यो दी ? इसे प्रणबध बनानेवाले उनके जैमा बुद्धिहीन व्यक्ति कोई है क्या ? कुछ कहते--पूर्व-पुण्य से ही यह कार्य पूर्ण हो भी सकता है। कुछ कहते—क्या सीता ने अपने (विवाह के) लिए दाँव पर रखे गये इस धनुप को कभी देखा भी है ?

कुछ कहते--इस धनुप से छोडे गंय वाण का लक्ष्य कौन हो सकता है ? कुछ कहतं—इस महान् धनुष को अपनी कन्या के सामर्थ्य के अनुरूप ही बनाया है। कुछ कहते—चक्रायुध धारण करनेवाला (महाविष्णु) क्या निश्चय ही इस धनुष को झुका सकता है ? कुछ कहते—यह पूर्वजन्म-कृत पाप ही है (जो प्रणबंध होकर यहाँ पड़ा है)।

वहाँ एकत्र नर-नारी इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब सेवको ने वह धनुष जनक के सम्मुख रखा, जिससे धरित्री की पीठ नीचे को धँम गई। उस धनुष को देखते ही वहाँ के राजाओ की भुजाएँ, यह सोचकर कि 'इसे कौन चढ़ा सकता है?', काँपने लगी।

जनक महाराज (कभी) कलभ जैसे उस वीरकुमार (राम) के सौन्दर्य को देखते, कभी दुःख देनेवाले उस बडे धनुष को देखते, फिर अपनी पुत्री (सीता) की ओर देखत । उनके मन की अधीरता को जानकर शतानन्द कहने लगे---

मेरु को धनुष बनानेवाले शिवजी, अपने पार्श्व मे रहनेवाली उमा का अपमान करनेवाले दक्ष के यज्ञ मे, क्षमारहित क्रोध के साथ, इसी धनुष को लेकर गये थे।

(शिवजी के किये गये आघातो से उन देवताओ के) दाँत और हाथ टूटकर गिर पडे। वे देवता भागे और अज्ञात स्थानो मे जा छिपे। दक्ष की यागाग्मियाँ ध्वस्त हो गई' , तब जाकर त्रिनेत्र तथा अष्टभुजावाले रुद्र का क्रोध शान्त हुआ।

उसके बाद शिवजी ने देवों की थरथराहट देखी। उन देवो की आयु अभी शेष थी। अतः, (शिवजी ने) उस दृढ धनुष को इस वृषभ-समान वीर जनक के वंश में उत्पन्न एक खड्गधारी नरेश को दे दिया।

इस धनुष की कठोरता के बारे मे मुझे कहना ही क्या है ? दीर्घजटाधारी (शिव)

बालकाण्ड ६६

तुल्य हे मुनिवर ( विश्वामित्र ) ! आपसे बढ़कर सर्वज्ञ दूसरा कौन है ? अब रथ के सदृश जघनवाली जनक की पुत्री इस सीता का वृत्तान्त भी सुनिए ।

एक बार हमने यज्ञ करने का उपक्रम करके लौह-समान दीर्घ शृंगद्वय से भूषित दो वृषभों के अतिभारी कंधों पर स्फटिकमय जुआ रखा और उससे असंख्य रत्न-खचित हल को बाँधा और उसमें हीरे की बनी फाल लगाकर दृढ़ भूमि को जोता ।

जोतते समय फाल के सिरे पर उदीयमान कांतिपूर्ण-सूर्य की जैसी एक सुन्दरी निकल पड़ी, मानो भूमि स्वयं नारी की आकृति धारण कर निकल आई हो। वह इतनी सुन्दरी थी कि क्षीराब्धि से स्वच्छ अमृत के साथ उत्पन्न लक्ष्मी भी अपने को छोटी मानकर दूर हटकर खड़ी हो जाय तथा हाथ जोड़कर नमस्कार करे ।

इस कन्या के गुणों के संबंध में क्या बताऊँ ? सभी सद्गुण इस लतांगी के पास रहकर नव जीवन पाना चाहते हैं और चढ़ा-ऊपरी करते हुए इसके पास आ पहुँचते हैं। रूप-सौन्दर्य बड़ी तपस्या करके ऐसी कन्या को प्राप्त कर सका है। विशाल कर्णाभरणों से अलंकृत इस कन्या के आविर्भाव से अन्य सभी सुन्दरियाँ वैसे ही शोभाहीन हो गईं, जैसे सूर्य से प्रकाशमान नभ से गंगा के भूमि पर उतर आने से अन्य नदियाँ प्रभावहीन हो गई थीं ।

हे सर्वज्ञ ! (जो सीता का पाणिग्रहण करना चाहता है, उसे) धनुर्विद्या का चातुर्य अपने व्यापार में प्रकट करना होगा और (उसके लिए) भाग्य का भी बल होना आवश्यक है। ये दोनों (बल) किसी के पास एक साथ नहीं रहते, उनके पृथक्-पृथक होने पर भी पृथ्वी के सभी राजाओं ने इस सीता को प्राप्त करना चाहा, जैसे समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी को सभी देवताओं ने अपनाना चाहा था। ऐसे आश्चर्य का विषय संसार में और क्या होगा ?

अपनी सूँड़ से मद-जल बहानेवाले मत्तगज के जैसे राजा अपनी भारी सेनाओं-समेत, कोलाहल मचाते हुए, समुद्र के समान आते और सीता का पाणिग्रहण करने की इच्छा प्रकट करते । उनके उत्तर में हम कहते—व्याघ्रचर्म को कटि मे तथा गजचर्म को उत्तरीय के रूप मे धारण करनेवाले (शिवजी) ने युद्ध मे जिस धनुष का प्रयोग किया था, उसे चढ़ानेवाला ही इस सीता का वर हो सकता है।

वाणी-रूपी धनुष से लोक की रक्षा करनेवाले (हे विश्वामित्र) ! वे राजा इस कठोर (शिव) धनुष को चढ़ाने मे असमर्थ हुए। परन्तु, वे मन्मथ के छोटे-से ईख के धनुष (के बाणों) को भी सहने मे असमर्थ थे, इसलिए वे कर्णाभरण-विभूषित उस सीताजी को बहुत चाहने लगे, जिसके विवाह के लिए शिवधनुष पण बनाया गया था, अतः वे हमारे साथ युद्ध करने आये।

हमारे महाराज (जनक) की सेना इस प्रकार घटती गई, जैसे किसी दाता राजा की यशःप्रद संपत्ति घटती है। किन्तु, गुंजायमान भ्रमरों से अलंकृत घुँघराली लटों से सुशोभित सीता के मोह से आये हुए उन राजाओं की सेनाएँ उनकी इच्छा के सदृश ही विफल हुईं।

६२ कंब रामायण

उज्ज्वल किरीटधारी देवो ने जब देखा कि बलशाली सुन्दर भुजावाले ये (जनक) वृषभवाहन (शिव) के धनुष के कारण उत्पन्न युद्ध मे शिथिल पड़ रहे है, तब उन्होंने कृपा करके इन्हे चतुरंग सेना प्रदान की। उस सेना को देखते ही वे शत्रु राजा डरकर इस प्रकार भागे, जैसे रात मे उल्लू को देखकर कौए डरकर भाग जाते हैं।

तव से अवतक अन्य कोई राजा इस शिव-धनुष के पास भी नही फटका। वे रथी नरेश, जो डर के मारे भाग खडे हुए थे, कभी नही लौटे। हम यही सोचते रह गये कि अब सीता का विवाह नही होनेवाला है। यदि यह कुमार (राम) धनुष चढ़ा दे, तो बड़ा हित होगा और पुष्पमालाालंकृत सीता का लावण्य व्यर्थ नही जायगा।—शतानन्द यों कहकर चुप हो रहे।

अपूर्व तपस्वी (विश्वामित्र) ने उस मुनि के वचनो पर विचार किया, फिर जटालंकृत अपना सिर हिलाया और युद्ध-कला मे निपुण वृषभतुल्य राम के मुख की ओर निहारा। चित्र की प्रतिमा-जैसे सौन्दर्यवान् (रामचन्द्र) ने विश्वामित्र के मन का विचार ताडकर उस दीर्घ शिव-धनु पर दृष्टिपात किया।

प्रवाहित घृत की आहुति पाकर जैसे प्रज्वलित अग्नि ऊपर उठती है, वैसे ही रामचन्द्र अपना आसन छोड़ उठ खडे हुए और (धनुष की ओर) पग धरने लगे। तब देवगण ने 'धनुर्भंग हो गया।' कहकर घोष किया। शत्रुत्रय, (काम¹ क्रोध और मोह) को परास्त करनेवाले ऋषियो ने उन्हे आशीष दिये।

पवित्र तपःसपन्न मुनि की आज्ञा पाकर श्रीराम ने अभी शिव-धनुप को चढाया भी नही था कि अनंग (मन्मथ) ने मनोहर आभूषणो से भूपित तरुणियों के हृदय मे तीर मार-मारकर सहस्रो धनुषों को तोड़ दिया।

वहाँ की नारियाँ कई प्रकार की बातें करने लगी। कोई कहती—यह सामने रखा हुआ धनुष भीतर से बहुत ही कठोर है। और कोई कहती—यदि लज्जाशील सीता के मनोहर लाल कर को इस कुमार (राम) का विशाल हाथ न छुए, तो (अर्थात्, इन दोनो का विवाह न हो तो) क्रात ललाटवाली (सीता) का जीवन ही व्यर्थ हो जायगा।

कुछ नारियाँ अपने करो को जोड़कर कहती—यदि मत्तगज-समान यह राजकुमार हमारी आँखो को आनन्दाश्रु से भरते हुए इस धनुप को न चढ़ा दे, तो हम कस्तूरीगंध-युक्त केशोवाली सीता के साथ जलानेवाली अग्नि मे डूब जायेंगी।

कोई कहती—ये वदान्य महाराज (जनक) यदि सीता का विवाह करना चाहते, तो इस राजकुमार को देखते ही यह कहकर कि 'मेरी कन्या सीता से विवाह कर लो,' पहले ही अपनी कन्या उन्हे दे देते। उलटे, इन्होने गगा को जटा मे बाँधनेवाले (शिवजी) के धनुष को लाकर इस कुमार के सामने रख दिया है यह कैसा भोलापन है ?


¹ संस्कृत-ग्रन्थों मे अरि-षड्वर्ग' प्रसिद्ध र। तमिल-ग्रन्थों मे प्रायश काम, क्रोध, मोह, मद, लोभ, मात्सर्य—इन छह दुर्गुणों को काम, क्रोध और लोभ के अंतर्गत मानकर 'शत्रुत्रय' का प्रयोग होता है। —अनु०

बालकाण्ड ६३

कोई कहती—इस तत्त्वज्ञ मुनि में लज्जा नहीं है। कोई कहती--इस जनक से बढ़कर कठोर अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। यह श्रेष्ठ कुमार यदि इस धनुष को न झुकावे, तो पीनस्तनी सीता भाग्यहीन हो जायगी।

मयूर-सदृश नारियाँ इस प्रकार कह रही थीं। उधर साधुजन शुभबचन कह रहे थे। स्वर्ग में देवता आनन्दित हो रहे थे। तत्र वे (राम) नाग (मत्तगज) तथा नाग (पर्वत) को लजाते हुए आगे पग बढ़ाते हुए चले।

उन्होंने बड़े स्वर्ण-पर्वत-सदृश उस धनुष को इस प्रकार उठाया, मानो वे सुवर्ण-चूड़ियाँ पहनी हुई दुर्लभ रत्न-समान (सीता) को पहनाने के लिए कोई दीर्घ पुष्पमाला उठा रहे हों।

देखने में बाधा पड़ेगी, इस भय से सभी दर्शक निर्निमेष नयनों से देख रहे थे, किन्तु वे लोग यह देख और समझ भी नहीं पाये कि कब उन्होंने धनुष के एक सिरे को पैर से दबाया और कब उसको झुकाकर दूसरे सिरे पर डोरी चढ़ा दी। उन्होंने केवल धनुष का उठाना देखा और उसके टूटने की ध्वनि सुनी।

उस ध्वनि को सुनते ही देवता डर गये कि ब्रह्माण्ड ही फट गया है। वे चिन्ता करने लगे कि अब हम किसकी शरण में जायें। अब इस पृथ्वी की क्या दशा हुई। मैं क्या कहूँ? नीचे इस पृथ्वी को अपने सिरपर ढोनेवाला, इसका मूल स्वरूप आदिशेष भी यों भयभीत हुआ, मानो उसके सिर पर वज्र गिर पड़ा हो।

'जयशील, शत्रु-भयंकर, शूलधारी जनक को आज पुण्यफल प्राप्त हुआ है'—यह सोचकर देवों ने पुष्प-वर्षा की। मेघों ने सोने की वर्षा की। झाग-भरे सभी समुद्रों ने विविध रत्नों को बिखेरकर आनन्द-घोष किया। मुनियों ने आशीष दिये।

मिथिला नगरी में श्वेतशंख तथा अमृतनादयुक्त विविध वाद्य बज उठे। पुष्प-मालाएँ, आभरण, चन्दन, सुगंध-चूर्ण, सुगंध-द्रव्य, समुद्रों से उत्पन्न उज्ज्वल मुक्ताएँ, स्वर्ण, मणियों, उत्तम वस्त्र आदि वस्तुएँ वहाँ के लोग दान करने लगे। वह नगर ऐसा लगा, जैसे पर्वकाल में (पूर्णिमा या अमावास्या के दिन) समुद्र उमड़ पड़ा हो।

भाले के जैसे नुकीले नयन और रात्रि में शोभायमान चन्द्रोपम वदनवाली रमणियाँ, वर्षा-ऋतु में गगन के नीर-भरे बादलों को देखकर नाचनेवाली मयूरों की जैसी नाच उठीं। उस समय सुनाद-भरी मकरवीणा की संगीत-सुधा बरसने लगी और मंदहास तथा कर्णाभरणों की चमक चारों ओर छा गई।

मानिनी नारियों ने, जिनके रक्तवर्ण और काले सुन्दर नयन मस्ती से भरे थे, अपना मान छोड़कर अपने-अपने प्रियतम का आलिंगन कर लिया। विशाल समुद्र में जैसे सफेद बादल पानी पिये, वैसे ही दरिद्रों ने जनक-महाराज की संपत्ति को भर लिया।

नर्तकों के मधुर गीत, रमणियों के अमृत-गीत, तन्त्री-वाद्य बजानेवालों की मकर-वीणा से उत्पन्न मधु-सदृश दिव्य गीत तथा वंशी के विविध गीत—इन सबका पान करते हुए देवता अपने शरीर और प्राण के जड़ीभूत होने से यों खड़े रहे, मानो चित्र ही हों।

देवलोक की अप्सराएँ, प्रभु के धनुष तोड़ने का अद्भुत दृश्य देखने के लिए

६४ | कंब रामायण

भूतल पर उतर आई तथा अंगो के व्यापार मे, आकार मे, नाच मे, गान मे—सभी प्रकार से, भूतल की नारियो के साथ एकाकार हो गई और पृथ्वी की ललनाओ का (अप्सरा समझकर) आलिंगन करने लगी किन्तु इन ललनाओं को अपनी पलकें स्पंदित करते हुए देखकर विस्मय-विमुग्ध हो गई।

(दर्शकों में से) कुछ कहते—देखो, यह दशरथ का पुत्र है। कुछ कहते, यह कमलनयन है (विष्णु का भी एक नाम कमलनयन या 'पुण्डरीकाक्ष' है)। कुछ कहते—इसका शरीर ही कालमेघ है और (अतसी) पुष्प की तुलना करता है। कुछ कहते—यह मनुष्य नही है, मीन-भरे समुद्र का निवासी विष्णु ही है, किन्तु ससार भ्रम मे पड़ा है (इनको पहचान नही रहा है)।

कुछ कहते—इस कुमार (के सौन्दर्य) को देखने के लिए उस कुमारी (सीता) को सहस्र नयन चाहिए और उस लतांगी (सीता के सौन्दर्य) को देखने के लिए इस पुरुषश्रेष्ठ को भी वैसे ही सहस्र नयन चाहिए। फिर कहते—देखो, इसका भाई भी कितना सुन्दर है। इनको प्राप्त करके पृथ्वी अत्यत पुण्यवती हुई है। और, कुछ कहते—इस नगर मे इन कुमारों को ले आनेवाले मुनिवर (विश्वामित्र) को हम सभी नमस्कार करें।

यहाँ राजदरबार में यह दृश्य था। उधर चन्द्र और रात्रि के चले जाने पर (राम के) पुनर्दर्शन की अभिलाषा से, प्राणो को कुछ रोककर बैठी हुई उस लघुकटि, पीन उरोज, लाल रेखाओ से युक्त और काले भाले जैसे तीक्ष्ण नयन तथा स्वर्ण-कंकण से सुशोभित सीता की क्या दशा हुई, अब हम इसका वर्णन करेंगे।

वह सीता दोलायमान प्राणो के साथ (उष्णता से) शरीर को गलानेवाली पुष्प-शय्या को छोड़कर स्वर्णाभरणो से अलकृत चेरियो से घिरी हुई, वहाँ से उठी और सुन्दर कमल-सरोवर के तट पर एक स्फटिक-प्रासाद मे, चन्द्रकान्त से उत्पन्न शीतल जल से छिड़कायी हुई कोमल शय्या पर, बड़ी कठिनाई से जा लेटी।

(विरह-ताप से पीडित वह कहने लगी) शीतल सुरभित कमललताओ ! ऐसा प्रतीत होता है कि एक बाला की विरह-व्यथा को समझने की उदारता तुममें है, इसीलिए तुमने अपने पत्तो की छटा मे (उस श्रीरामचन्द्र के शरीर का) अपूर्व रंग दिखाकर मेरी मनोव्यथा को कुछ कम किया है, किन्तु मेरे पल्लव-समान रंग का हरण करनेवाले (उन रामचन्द्र) के नेत्रो की आतरिक काति को भी (अपने दलो में) दिखाकर मेरे प्राणो को लौटाने से क्यो पीछे हटती हो ?

(उन राम की भुजाओ को देखकर) लज्जित मेरु-सदृश उनका धनुष तथा उनकी डोरी पर सचरण करनेवाले उनके हस्त, स्तभ-सदृश उनके स्कध, बाणों से भरा तूणीर, उज्ज्वल चन्द्रिका-जैसा यज्ञोपवीत और जयमाला से अलकृत उनका वक्ष—ये सब फिर देखने को मिलेंगे, तो मेरे प्राण भी देखे जा सकेंगे। (अर्थात्, तभी मेरे प्राण बचेंगे, अन्यथा अदृश्य हो जायेंगे)।

नभोमडल मे प्रकाशमान चन्द्रमा और उनके साथ भ्रमरावृत पुष्पमालाधारी केशों

बालकाण्ड ६५

से अलंकृत दीर्घधनुर्धारी एक मेघ आया था, जो अपने दो नयनों से मेरे प्राणरूपी जल को उठाकर पी गया। वह मेघ मेरे हृदय में अब भी छाया हुआ है और सदा छाया रहेगा।

निष्ठुर मन्मथ ने ऐसे तीक्ष्ण वाण मेरे हृदय पर मारे हैं, जो तूल को जलाने-वाली अग्नि के समान मेरे प्राण हरकर चले गये हैं और उसे पीडित कर रहे हैं। अब मैं अत्यंत व्याकुल हो रही हूँ, ऐसी दशा में पास आकर मुझ अबला को जो अभयदान न दे, जो यह न कहे कि 'डरो मत, डरो मत'—उसका पौरुष भी कोई पौरुष है ?

हे कभी कृश न होनेवाले (मेरे) स्तन! उमड़ते-उमड़ते रहकर तुमने क्या काम किया ? उदय न होनेवाले (अर्थात्, सर्वदा एक जैसे चमकनेवाले) चन्द्र-जैसा कान्तिमान् वदनवाले, (शिव के) कठोर धनुष को उठानेवाले उस महाप्रभु (राम) के वक्ष का गाढालिंगन यदि प्राप्त करना चाहते हो, तो उसके लिए उचित तपस्या करो।

यह चन्द्रमा कहाँ से निकल आया है, जो मेरे ऐसे स्तनों पर विष बरसा रहा है, जिनसे मेरे हृदय में अनंग के द्वारा छोड़े गये शरों से उत्पन्न विरह-पीड़ा उमड़ रही है। विष बरसाने पर भी यह रात्रि-काल में उदित होनेवाला चन्द्र$^१$ नहीं है, क्योंकि इसके मध्य कलंक नहीं दीखता।

ह मेरे हृदय ! अनंग ने निकट आकर, क्रुद्ध हो शर बरसाये; उनके विष से जलाये जाकर भी मेरे ये प्राण जले नहीं है; किन्तु ये (प्राण) मेरे शरीर से निकलकर उष्ण मदजल बरसानेवाले काले हाथी के जैसे दीखनेवाले उस युवक (राम) के चरणों$^२$ की शरण में पहुँच गये थे। वे प्राण फिर लौटकर कैसे आयें ?

मानों गगनगत-मेघ, बिजली के साथ, इस धरती पर उतर पड़ा हो, ऐसा ही दीखनेवाला वह श्वेत यज्ञोपवीतधारी राजकुमार (रामचन्द्र) आया और चला गया। वह यद्यपि मेरे हृदय-गत है, तथापि मैं उसे जान नहीं पाती कि वह कौन है ? वह यद्यपि मेरे नयन-गत है, तथापि मैं उसे देख नहीं पाती। यह क्यों ?

उदार समुद्र में उत्पन्न, अन्यत्र दुर्लभ अमृत को पाकर भी उसे मनोहर स्वर्णकलश में न भरकर बहा देनेवाले मूर्ख के समान मैं रह गई और उस कुमार की महान् बलिष्ठ भुजाओं को देखते ही आलिंगन में न बाँधकर मैंने उसे हाथ से जाने दिया। अब बहुत कहने से क्या प्रयोजन ?

सोने के लेप-जैसे चिह्न-भरे स्तनोंवाली (सीता), उपर्युक्त प्रकार से कहती हुई, अत्यन्त व्याकुल हो, सिसक-सिसककर रोने और दुःख-सागर में डूबने लगी। इतने में मुदित-मन और अंजन-अंजित नयनोंवाली एक सखी पर्वत-जैसे धनुष के तोड़े जाने का समाचार लेकर आई। उसका वर्णन हम अभी करेंगे।

विशाल सरोवर में उत्पन्न नील कुईं समान नयनोंवाली माला नामक सखी, लचकती हुई बिजली की-सी शीघ्रता से आई; उसके रत्नमय कंठहार और कर्णाभूषण इन्द्रधनुष का


१. रामचन्द्र का मुख ही सीता की दृष्टि में फिर रहा है, जिसे वह चन्द्रमा समझती है।
२. 'विष्णुपद' के दो अर्थ होते हैं—(१) स्वर्ग तथा (२) राम के चरण। मृत्यु प्राप्त करने पर प्राण फिर कैसे शरीर में आये, यह संकेत है।

६८ कंब रामायण्

दृश्य उपस्थित कर रहे थे, तथा उनके घने पुष्प-भारित केश तथा वस्त्र नीचे खिसके पड़ते थे ।
वह सखी आई तो उसने सीताजी के चरणों का नमस्कार भी नहीं किया और
शोर मचाने लगी । असीम आनन्द में भरी हुई वह नाचने-गाने लगी । उसे देख सीता ने
पूछा—हे सुन्दरि ! तेरे मन में यह कैसा आनन्द है ? ऐसी क्या बात हुई है जो तू इतना
आनन्दित है ? तब वह सखी सीता के चरणों की वंदना कर कहने लगी—

गज, रथ, तुरग के समुद्र से युक्त विपुल विद्या-सपन्न, मेघ-सदृश (दान-वर्षा
करनेवाले) करों से युक्त, दशरथ नामक एक छत्रधारी चक्रवर्ती हैं । उनका पुत्र पुष्पबाणों
द्वारा प्रेम उत्पन्न करनेवाले मन्मथ से भी अधिक सुन्दर है ।

उस कुमार की भुजाएँ सालवृक्ष के-जैसे बढ़ी हुई हैं । उसे देखने से सन्देह उत्पन्न
होता है कि कहीं अनन्त पर शयन करनेवाले विष्णु भगवान ही तो इस रूप में नहीं आये हैं ।
उसका नाम है 'राम' । वह और उसका अनुज प्रशसनीय मुनिवर विश्वामित्र के संग इस
नगर में आये हैं ।

वलय-विभूषित भुजावाला वह महापुरुष शिवजी का धनुष देखने के लिए
आया है—यह समाचार विश्वामित्र से पाकर जनक ने वह धनुष लाने का आदेश दिया ।
वह धनुष लाया गया, तो उस पुरुषश्रेष्ठ ने उस पर डोरी चढ़ा दी । तब देवलोक भी काँप उठा ।

क्षण-भर में उसे पैर से दबाकर अपने भुजबल से ऐसा झुका दिया, मानो उस
धनुष को चढ़ाने का उसे पहले से ही अभ्यास रहा हो । तब देवताओं ने उसकी प्रशंसा की
और पुष्प-वर्षा की वह धनुष टूटकर ऐसा गिरा कि गजदरबार उस शब्द से काँप उठा ।

उस सखी ने जब यह कहा कि विश्वामित्र के साथ आया हुआ राजकुमार
मेघवर्ण है और कमलनयन विष्णु की छटावाला है, तब सीता का यह सन्देह दूर हो गया
कि यह वही राजकुमार है जिसे पहले दिन उसने देखा था या कोई अन्य । सीताजी का
नितंब (आनन्द से) ऐसा बढ़ गया कि मेखला टूट गई ।

(सीता की यह दशा देखकर सखियाँ आपस में कहने लगी) कोई कहती—
'इनके कटि नहीं है।' तो दूसरी कहती कि 'नहीं, इनके कटि है।' सीता के सुकुमार
स्तन उमंग से उभर उठे । यों आनन्दित होती हुई उसने मन में निश्चय कर लिया कि
इस सखी के कहे लक्षणों से लगता है कि अवश्य वही राजकुमार है। पर, यदि धनुष
तोड़नेवाला व्यक्ति कोई अन्य होगा, तो मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी ।

विरह-वेदना से पीड़ित सीता की दशा ऐसी हुई । उधर जनक महाराज ब्रह्मा
के द्वारा निर्मित धनुष के टूटने से उत्पन्न ध्वनि सुनकर अत्यन्त आनन्दित हुए और
विश्वामित्र से कहा—

'भगवान् ! क्या आप इस कुमार का विवाह अविलम्ब आज ही, कर देना
चाहते हैं या संबंध इस प्रकार का दृढ़ीकृत दिखलाकर तथा सुदर्शन वीर-चक्रबड़ारी और
गरजनेवाली सेनाश्री-सहित दशरथ चक्रवर्ती को भी यहाँ बुलाने के पश्चात् विवाह संपन्न
करना चाहते हैं ? आप कृपया बतावें ।

बालकाण्ड ६७

मल्लयुद्ध मे निपुण उस जनक के यों कहने पर महातपस्वी (विश्वामित्र) ने अपना मत प्रकट किया कि दशरथ का भी यहाँ आना अच्छा होगा। अति आनन्द-भरित राजा ने वहाँ का सारा वृत्तांत दशरथ से कहने का आदेश देकर, विवाहोत्सव के लिए निमन्त्रण-पत्र-सहित, दूतों को अयोध्या रवाना किया। (१-६६)


अध्याय १३

दशरथ-प्रस्थान पटल

जनक के द्वारा प्रेषित वे दूत अतिवेग से, पवन के जैसे चलकर वज्र-ध्वनि करने-वाले नगाड़ों से प्रतिध्वनित अयोध्यापुरी में आ पहुँचे और दशरथ चक्रवर्त्ती के उस प्रासाद के द्वार पर गये, जहाँ चक्रवर्त्ती के चरणों की वन्दना करने के लिए आये हुए राजा लोग अति भीड़ के कारण भीतर जाने का मार्ग न पाकर वही (द्वार पर ही) एकत्र हो गये थे और (भीड़ के कारण) उनके किरीट एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे।

(अत मे) दूतों को चक्रवर्त्ती की कृपा प्राप्त हुई और वे यथाविधि राजा के सम्मुख जाकर उनके अति उज्ज्वल चरण-युगल को नमस्कार किया तथा उनकी स्तुति की। फिर बोले—हे महाराज ! आपके पुत्र जबसे विश्वामित्र के साथ चले, तबसे जो घटनाएँ घटित हुईं, उन्हे हम आपको सुनाते हैं। यह कहकर (उन्होंने) समस्त वृत्तांत कह सुनाया।

सारा वृत्तांत सुनाने के पश्चात् उन्होने अपने साथ लाये हुए पत्र को दशरथ के हाथ में दिया और कहा कि हे अनतगुणसंपन्न ! यह उस जनक महाराज द्वारा प्रेषित पत्र हैं। दरबार मे स्थित एक पडित ने उस पत्र को आनंद के साथ ले लिया। तब मुखरित वीर-वलय पहने हुए (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने उस पत्र को पढ़ने की आज्ञा दी।

जनक ने ताल-पत्र पर उनके (दशरथ के) ज्येष्ठ पुत्र की धनुर्विद्या-चातुरी का जो चित्र अंकित करके भेजा था, उसके अपने श्रुति-पट पर अंकित होते ही दशरथ की वज्र-सम भुजाएँ पर्वत के जैसे फूल उठी और (भुजा के) वलय अपना मुँह बाये अपने स्थानों से खिसक गये।

जयप्रद शूलधारी (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने कहा—उस दिन यहाँ एक बड़ी ध्वनि प्रतिध्वनित हुई थी, वह क्या उसी धनुष के टूटने की थी, जिसका प्रयोग घनी दीर्घ जटा-धारी, विशाल गण-सहित (शिवजी ने) दक्ष-यज्ञ के समय सातो लोको को पराजित करते हुए किया था ?

पर्वत-सदृश पुष्ट भुजावाले (दशरथ) ने उपर्युक्त वचन सभी दरबारियो से कहा. फिर अनुरूप नादविशिष्ट वीर-वलयधारी दूतों को स्वर्णमय आभरण, वस्त्र आदि निरंतर और अधिकाधिक मात्रा में दिलाते रहे।

६८
कंब रामायण

उन्होंने आज्ञा दी कि हाथियों पर बैठकर नगाड़े बजाये जायें और इस बात की घोषणा की जाय कि सूर्यवंशी मेरे पूर्वजों के पुण्य-फल से उत्पन्न मन्मथ जैसेश्रीरामचन्द्रजहाँ हैं, उस मिथिला नगरी की ओर हमारी सेनाएँ तथा राजसमूह पहले प्रस्थान करें ।

‘वल्लुवन’$^१$ ने अति वेगवान् अश्व-रूपी तरंग-युक्त (सेना-रूपी) समुद्र में घूम-घूमकर उपर्युक्त घोषणा सुनाई, (ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार) पूर्वकाल में जब मधुस्रावी तुलसी-पुष्पमाला से विभूषित शिरवाले विष्णु भगवान् ने (बलि का) दान स्वीकार करते हुए समस्त लोकों को नापा था, और जाम्बवान् ने उसकी घोषणा घूम-घूमकर प्रकाशित की थी।

नगाड़े का तुमुल शब्द कानों में पड़ने के पहले ही, मनोहर कंकण पहने हुई नारियाँ, सुन्दर पुरुष, भाले के (प्रयोग में) निपुण राजकुमार, विजयी नरेश, सभी आनन्द से यों उमंगित हो उठे, जैसे प्रभंजन से आहत समुद्र हों।

वृषभ-समान गंभीर पदगतिवाले (दशरथ) की सेनावाहिनी, जिसकी विशालता से ऐसा जान पड़ता था कि धरती पर थोड़ा भी खाली स्थान नहीं है, इस प्रकार चली, जैसे कल्पान्त के समय प्रलय-मारुत से विताड़ित होकर समुद्र सभी वस्तुओं को मिटाकर उमड़ता हुआ आगे बढ़ रहा हो।

(उस सेना के मध्य) डंडे के ऊपर फैले हुए ऊँचे श्वेतच्छत्र यत्र-तत्र ऐसे लगते थे, मानो असंख्य हंस दुग्ध-समान श्वेत कांति बिखेरते हुए उड़ रहे हों। नभ में छाई हुई ऊँची पताकाओं का समूह ऐसा लगता था मानो सारा आकाश (सर्प के समान) अपनी केंचुली उतारकर गिरा रहा हो।

हस्तिसेना के ऊपर उड़नेवाली श्वेत वस्त्रों की ध्वजाएँ उन मेघों की तरह लगती थीं, जो अपनी सूँड से मदजल बहानेवाले हाथियों की सेना को भ्रांति से समुद्र समझकर अंतराल को ढकते हुए उमड़ आये हों और जल पीने के लिए नीचे उतर रहे हों।

(नर-नारियों के) आभरणों से बालातप छिटक रहा था। वह बालातप मयूर-पक्षों से बने छत्रों की छाया को हटाता हुआ फैल रहा था। वे मयूर-छत्र मेघ की शोभा को मिटाते हुए विकसित हो रहे थे। उन मेघों को परास्त करते हुए पुंजीभूत नगाड़े बज उठते थे।

वे किंकिणीधारी अश्व, जिनपर रमणियाँ सवार होकर जा रही थीं, हंसों को लेकर चलनेवाली तरंग-युक्त नदी के प्रवाह-जैसे लगते थे। स्वर्णाभरण-भूषित, परस्पर संघट्ट-मान स्तनोंवाली, घुँघराली अलकों से युक्त रमणियाँ बिजली की जैसी थीं और उनके वाहन—छोटी-छोटी हथिनियाँ मेघों की जैसी थीं।

एक दूसरे को धक्का देते हुए, बड़ी भीड़ लगाकर चलने के कारण रमणियों के सटे हुए कुचों पर के कुंकुम-लेप तथा पुरुषों की सुंदर पर्वत-जैसी भुजाओं पर के चंदन-लेप, मार्ग


१ तमिल-देश में, प्राचीनकाल में 'वल्लुव' नामक जातिवाले राजघोषणा का ढिंढोरा पीटने का कार्य करते थे। —अनु०

बालकाण्ड ६६

में स्थान-स्थान पर गिर रहे थे, जिससे उस सेना-समुद्र का मार्ग कोमल पर्यंक के सदृश शोभित हो रहा था।

चाशनी से भी अधिक मीठी बोलीवाले लाल अधरों से शोभित रमणियों के आँचल में छिपे हुए यम (अर्थात्, काल की तरह मरण-पीडा उत्पन्न करनेवाले स्तन) मुक्ताओं से विभूषित होने से राका की चंद्रिका फैलाते थे ओर बहुल रत्नहारों से विभूषित होने से प्रातःकालिक बालातप फैलाते थे।

उस सेना के पुरुष सुरभित कुंतलवाले थे, पर्वतों को लजानेवाले थे, सोने के आभूषणों से विभूषित थे तथा धनुष और खड्ग धारण किये थे। वे अपनी लता जैसी कटिवाली प्रेयसियों के सग ऐसे चले, जैसे सुन्दर हथिनियों का अनुमरण करते हुए मत्तगज चलते हैं।

कुछ रमणियाँ पालकियों में बैठकर जा रही थी। सुरभित, मनोहर तथा नव-विकसित पुष्पों से भरे हुए मेघों का दृश्य उपस्थित करनेवाले केशों से विभूषित उन रमणियों के मुखमात्र (उन पालकियों में से) दिखाई पड़ने थे, जिससे ऐसा लगता था, मानो अनेक पूर्ण-चन्द्र विमानों पर चढ़कर जा रहे हों।

प्रवहमाण मदजल की वर्षा थमती नहीं थी। उससे जो कीचड़ उत्पन्न हो जाता था, उसमें मुखपट्टधारी हाथी फँस जाते थे और पागल हो जाते थे, वे (उस कीचड़ से) बाहर न निकल सकने के कारण घनी तरंगोंवाले समुद्र के समान शब्दायमान नथनोंवाली अपनी सूँड़ों को उठा-उठाकर टटोलते थे, मानो दिग्गजों को खोज रहे हों।

घोड़ों की पंक्तियाँ किंकिणियों के कलरव तथा टापों के ताल के साथ फाँदती हुई जा रही थी। देवों के समान ही उनके पैर धरती को छू नहीं रहे थे। उनकी चाल वार-नारियों के मन के समान थी, जो (बाहर से अधिक प्रेम दिखाने पर भी) अंतर से प्रेम-रहित होती हैं। (भाव यह है कि जिस प्रकार वारनारियों का मन बाहर से कुछ ओर, भीतर से कुछ और होता है, उसी प्रकार घोड़ों के पैर पृथ्वी को छूते हुए भी न छूते-से लगते थे।)

कुछ मानवती स्त्रियाँ (जो अपने पतियों से रूठी हुई थीं) अपनी दृष्टि अपने पति पर नहीं डालती थीं, वे निःश्वास भरती थीं, उनकी भौंहें तनी हुई थी, पल्लव-सयुक्त पुष्प भी नहीं पहने थीं। वे अपने पतियों के सग ऐसे चल रही थीं, मानो उन (पतियों) के प्राण ही जा रहे हों।

झरने के समान मद-धारा प्रवाहित करनेवाले गडस्थलयुक्त, अंकुश का नाम सुनते ही कोपाग्नि उगलनेवाले निर्भीक हस्तिगण, पर्वतों को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझकर, उनसे टकरा जाते थे। बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़कर नीचे गिरा देते थे और कभी उनको रगड़ते हुए निकल जाते थे। वे ऐसे चलते थे, जैसे कोई नदी-प्रवाह हों।

सभी दुःख-मग्न प्राणियों के आलंबन-भूत, करुणाद्र वे (दशरथ) अभी प्रस्थान के लिए उठे भी नहीं (क्योंकि वे इसी प्रतीक्षा में थे कि अयोध्या की सारी सेना पहले प्रस्थान कर जाये, तो उनके पीछे चलें) कि उधर धरती में कोई खाली स्थान नहीं है, ऐसा भाव